PRASTHĀNABHEDA | प्रस्थानभेदः

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ग्रन्थ | Text No.

⬥ ग्रन्थ 1 ⬥

मूलम् | Original Text
अथ सर्वेषां शास्त्राणां भगवत्येव तात्पर्य साक्षात्परम्परया वेति समासेन तेषां प्रस्थान भेदोऽत्रोद्दिश्यते।
श्री श्रीनिवासपरब्रह्मणे नमः ॥
Hindi Translation
यह शिष्टाचार से प्राप्त तथा आगम से अनुमोदित है कि विघ्नों के विनाश या ग्रंथ की परिसमाप्ति के लिये आस्तिक जनों को ग्रंथादि के प्रारम्भ में मङ्गल का आचरण आवश्यक है। यहाँ इसका विशेष विवेचन प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि अनेक ग्रंथों में इसकी व्याख्या की गयी है। अधिक जानकारी के इच्छुक सज्जन को उन-जन ग्रन्थों से ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। इतना निश्चित है कि ग्रंथादि के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण आवश्यक है, परन्तु शिष्टों के अग्रणी एवं परमभक्त मधुसूदन सरस्वती ने प्रस्तुत ‘प्रस्थान भेद' नाम के ग्रंथ के आरम्म में मङ्गल क्यों नहीं किया? यह प्रश्न स्वाभाविक उठ सकता है।

इसका समाधान यह है कि उन्होंने मङ्गलाचारण किया है। ग्रंथ के प्रारम्भ में 'अथ' शब्द का उच्चारण किया है। 'अथ' शब्द और 'ॐकार' 'मङ्गलार्थक माना गया है, क्योंकि सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के मुख्य से सर्वप्रथम इन्हीं दोनों शब्दों का उच्चारण हुआ। दूसरी बात यह है कि मकार भगवान् वासुदेव का वाचक होता है। कहा भी है-- "आकारो वासुदेवः स्यात्। (अकार वासुदेव होता है) भगवद्‌गीता में भगवान् कृष्ण ने स्वयं कहा है कि मैं अक्षरों में अकार हूँ। (अक्षराणामकारोस्मि) एवं अष्टश्लोकी में भी कहा गया है कि अकार कर अर्थ विष्णु होता है। (अकारार्थो विष्णुः जगदुदयरक्षाप्रलयकृत)। इसलिये सर्वप्रथम अकार के उच्चारण से विष्णु के स्मरण द्वारा मङ्गल हो गया।

यदि कहा जाय कि यह 'अथ' शब्द प्रारम्भार्थक है। अतः मङ्गलार्थक नहीं माना जा सकता, परन्तु यह समुचित नहीं है। कारण यह है कि प्रारम्भार्थक मान लेने पर भी वह मङ्गलार्थक हो ही सकता है, दोनों प्रयोजन उसी से सिद्ध हो जायेंगे। जिस प्रकार भोजन के लिये दधि का आनयन गमनार्थी के लिये मंगल सूचक भी हो जाता है, उसी प्रकार यह 'अथ' शब्द आरम्भ और मंगल दोनों का बोधक होगा। महाभाष्यकर ने भी कहा है कि 'द्विगताऽपिहतवो भवन्ति-आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च प्रीणिता इति”। अर्थात् दो में रहने वाले भी हेतु होते हैं, जैसे एक ही तर्पण क्रिया से आम्रवृक्ष का सेचन और पितरों की प्रसन्नता भी होती है। उसी प्रकार यह 'अथ' शब्द आरम्भ का सूचक तथा मंगल का प्रतिपादक भी है। अतः ग्रंथकार ने आगम को मानते हुए शिष्टाचार की रक्षा की और नास्तिक्य के आरोप का खंडन करके ग्रंथ का आरम्भ किया है।
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