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Introduction
The *Prasthānabheda*, authored by Madhusudana Sarasvati, is a concise 16th-century Sanskrit treatise that presents a systematic classification of diverse Indian philosophical, religious, and textual traditions, integrating them within a unified Advaita Vedānta framework.
It categorizes major *darśanas* such as Vedānta, Nyāya, and Mīmāṃsā, along with Vedic, Tantric, and Purāṇic traditions, thereby offering a structured intellectual map of Indian knowledge systems while emphasizing the reconciliatory vision of Advaita.
The work serves as an important guide for understanding the hierarchy and interrelation of various *prasthānas* (approaches), presenting them as progressive stages culminating in non-dual realization, and holds significant value in the historical and comparative study of Indian philosophical literature.
Credits: Divya Prakash Pathak; Shraddha Aggarwal (Data Collection); Prof. Subhash Chandra; Dr. Avadhesh Pratap Singh; Prof. Om Nath Bimali ( First Summer School on Sanskrit Computational Linguistics 2025, University of Delhi)
Source: Standard editions and translations of *Prasthānabheda* in Indological scholarship.
It categorizes major *darśanas* such as Vedānta, Nyāya, and Mīmāṃsā, along with Vedic, Tantric, and Purāṇic traditions, thereby offering a structured intellectual map of Indian knowledge systems while emphasizing the reconciliatory vision of Advaita.
The work serves as an important guide for understanding the hierarchy and interrelation of various *prasthānas* (approaches), presenting them as progressive stages culminating in non-dual realization, and holds significant value in the historical and comparative study of Indian philosophical literature.
Credits: Divya Prakash Pathak; Shraddha Aggarwal (Data Collection); Prof. Subhash Chandra; Dr. Avadhesh Pratap Singh; Prof. Om Nath Bimali ( First Summer School on Sanskrit Computational Linguistics 2025, University of Delhi)
Source: Standard editions and translations of *Prasthānabheda* in Indological scholarship.
Acknowledgements
Designed and Developed by
Deepjyoti Deb, Divya Prakash Pathak & Prof. Subhash Chandra
Department of Sanskrit, University of Delhi
ग्रन्थ | Text No.
⬥ ग्रन्थ 1 ⬥
मूलम् | Original Text
अथ सर्वेषां शास्त्राणां भगवत्येव तात्पर्य साक्षात्परम्परया वेति समासेन तेषां प्रस्थान भेदोऽत्रोद्दिश्यते।
श्री श्रीनिवासपरब्रह्मणे नमः ॥
श्री श्रीनिवासपरब्रह्मणे नमः ॥
Hindi Translation
यह शिष्टाचार से प्राप्त तथा आगम से अनुमोदित है कि विघ्नों के विनाश या ग्रंथ की परिसमाप्ति के लिये आस्तिक जनों को ग्रंथादि के प्रारम्भ में मङ्गल का आचरण आवश्यक है। यहाँ इसका विशेष विवेचन प्रस्तुत करना आवश्यक नहीं है, क्योंकि अनेक ग्रंथों में इसकी व्याख्या की गयी है। अधिक जानकारी के इच्छुक सज्जन को उन-जन ग्रन्थों से ज्ञान प्राप्त कर लेना चाहिए। इतना निश्चित है कि ग्रंथादि के प्रारम्भ में मङ्गलाचरण आवश्यक है, परन्तु शिष्टों के अग्रणी एवं परमभक्त मधुसूदन सरस्वती ने प्रस्तुत ‘प्रस्थान भेद' नाम के ग्रंथ के आरम्म में मङ्गल क्यों नहीं किया? यह प्रश्न स्वाभाविक उठ सकता है।
इसका समाधान यह है कि उन्होंने मङ्गलाचारण किया है। ग्रंथ के प्रारम्भ में 'अथ' शब्द का उच्चारण किया है। 'अथ' शब्द और 'ॐकार' 'मङ्गलार्थक माना गया है, क्योंकि सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के मुख्य से सर्वप्रथम इन्हीं दोनों शब्दों का उच्चारण हुआ। दूसरी बात यह है कि मकार भगवान् वासुदेव का वाचक होता है। कहा भी है-- "आकारो वासुदेवः स्यात्। (अकार वासुदेव होता है) भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण ने स्वयं कहा है कि मैं अक्षरों में अकार हूँ। (अक्षराणामकारोस्मि) एवं अष्टश्लोकी में भी कहा गया है कि अकार कर अर्थ विष्णु होता है। (अकारार्थो विष्णुः जगदुदयरक्षाप्रलयकृत)। इसलिये सर्वप्रथम अकार के उच्चारण से विष्णु के स्मरण द्वारा मङ्गल हो गया।
यदि कहा जाय कि यह 'अथ' शब्द प्रारम्भार्थक है। अतः मङ्गलार्थक नहीं माना जा सकता, परन्तु यह समुचित नहीं है। कारण यह है कि प्रारम्भार्थक मान लेने पर भी वह मङ्गलार्थक हो ही सकता है, दोनों प्रयोजन उसी से सिद्ध हो जायेंगे। जिस प्रकार भोजन के लिये दधि का आनयन गमनार्थी के लिये मंगल सूचक भी हो जाता है, उसी प्रकार यह 'अथ' शब्द आरम्भ और मंगल दोनों का बोधक होगा। महाभाष्यकर ने भी कहा है कि 'द्विगताऽपिहतवो भवन्ति-आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च प्रीणिता इति”। अर्थात् दो में रहने वाले भी हेतु होते हैं, जैसे एक ही तर्पण क्रिया से आम्रवृक्ष का सेचन और पितरों की प्रसन्नता भी होती है। उसी प्रकार यह 'अथ' शब्द आरम्भ का सूचक तथा मंगल का प्रतिपादक भी है। अतः ग्रंथकार ने आगम को मानते हुए शिष्टाचार की रक्षा की और नास्तिक्य के आरोप का खंडन करके ग्रंथ का आरम्भ किया है।
इसका समाधान यह है कि उन्होंने मङ्गलाचारण किया है। ग्रंथ के प्रारम्भ में 'अथ' शब्द का उच्चारण किया है। 'अथ' शब्द और 'ॐकार' 'मङ्गलार्थक माना गया है, क्योंकि सृष्टि के आदि में ब्रह्मा के मुख्य से सर्वप्रथम इन्हीं दोनों शब्दों का उच्चारण हुआ। दूसरी बात यह है कि मकार भगवान् वासुदेव का वाचक होता है। कहा भी है-- "आकारो वासुदेवः स्यात्। (अकार वासुदेव होता है) भगवद्गीता में भगवान् कृष्ण ने स्वयं कहा है कि मैं अक्षरों में अकार हूँ। (अक्षराणामकारोस्मि) एवं अष्टश्लोकी में भी कहा गया है कि अकार कर अर्थ विष्णु होता है। (अकारार्थो विष्णुः जगदुदयरक्षाप्रलयकृत)। इसलिये सर्वप्रथम अकार के उच्चारण से विष्णु के स्मरण द्वारा मङ्गल हो गया।
यदि कहा जाय कि यह 'अथ' शब्द प्रारम्भार्थक है। अतः मङ्गलार्थक नहीं माना जा सकता, परन्तु यह समुचित नहीं है। कारण यह है कि प्रारम्भार्थक मान लेने पर भी वह मङ्गलार्थक हो ही सकता है, दोनों प्रयोजन उसी से सिद्ध हो जायेंगे। जिस प्रकार भोजन के लिये दधि का आनयन गमनार्थी के लिये मंगल सूचक भी हो जाता है, उसी प्रकार यह 'अथ' शब्द आरम्भ और मंगल दोनों का बोधक होगा। महाभाष्यकर ने भी कहा है कि 'द्विगताऽपिहतवो भवन्ति-आम्राश्च सिक्ताः पितरश्च प्रीणिता इति”। अर्थात् दो में रहने वाले भी हेतु होते हैं, जैसे एक ही तर्पण क्रिया से आम्रवृक्ष का सेचन और पितरों की प्रसन्नता भी होती है। उसी प्रकार यह 'अथ' शब्द आरम्भ का सूचक तथा मंगल का प्रतिपादक भी है। अतः ग्रंथकार ने आगम को मानते हुए शिष्टाचार की रक्षा की और नास्तिक्य के आरोप का खंडन करके ग्रंथ का आरम्भ किया है।
⬥ ग्रन्थ 2 ⬥
मूलम् | Original Text
अथ सर्वेषां शास्त्राणां भगवत्येव तात्पर्य साक्षात्परम्परया वेति समासेन तेषां प्रस्थान भेदोऽत्रोद्दिश्यते। तथाहि - ऋग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्ववेद इति वेदाश्चत्वारः । शिक्षा कल्पो व्याकरणं निरुतं छन्दो ज्योतिषमिति वेदाङ्गानि षट् । पुराणन्याय-मीमांसा धर्मशास्त्राणि चेति चत्वार्युपाङ्गानि । अत्रोपपुराणानामपि पुराणेऽन्तर्भावः । वैशेषिकशास्त्रस्य न्याये वेदान्तशास्त्रस्य मीमांसायाम् । महाभारतरामायणयोः सांख्यपातंजलपाशुपतवैष्णवादीनां च धर्मशास्त्रे । मिलित्वा चतुर्दश विद्याः । तथा चोतां याज्ञवल्क्येन (१-३)।
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशालाङ्गमिश्रिताः।
वेदाः स्थानानि विद्मा धर्मस्य च चतुर्दश ॥ इति ।
एता एवं चतुर्भिरूपवेदैः सहिता अष्टादशविद्या भवन्ति । आयुर्वेदो, धनुर्वेदो गान्धर्ववेदोऽर्थशास्त्रं चेति चत्वार उपवेदाः। सर्वेषां चाऽस्तिका नामेतावन्त्येव शास्त्रप्रस्थानानि । अन्येषामप्येकदेशिनामेतेष्वेवान्तर्भावात् ।
ननु नास्तिकानामपि प्रस्थानान्तराणि सन्ति तान्येतेष्वनन्तर्भावा-त्पृथमार्गावतुमुचितानि । तथाहि - शून्यवादेनैकं प्रस्थानं माध्यमिकानाम् । क्षणिकविज्ञानमात्रवादेनान्यद्योगाचाराणाम् । ज्ञानाकारानुमेयक्षणिक-बाह्यार्थवादेनापरं सौत्रान्तिकानाम् । प्रत्यक्षसलक्षणक्षणिकबाह्यार्थ-वादेनापरं वैभाषिकाणाम्। एवं सौगतानां प्रस्थानचतुष्टयम् । तथा देहात्मवादेनैकं प्रस्थानं चार्वाकाणाम्। एवं देहातिरिक्तदेहपरिमाणात्मवादेन द्वितीयं प्रस्थानं दिगम्बराणाम्। एवं मिलित्वा नास्तिकानां षट् प्रस्थानानि, तानि कस्मान्नोच्यन्ते ।
पुराणन्यायमीमांसाधर्मशालाङ्गमिश्रिताः।
वेदाः स्थानानि विद्मा धर्मस्य च चतुर्दश ॥ इति ।
एता एवं चतुर्भिरूपवेदैः सहिता अष्टादशविद्या भवन्ति । आयुर्वेदो, धनुर्वेदो गान्धर्ववेदोऽर्थशास्त्रं चेति चत्वार उपवेदाः। सर्वेषां चाऽस्तिका नामेतावन्त्येव शास्त्रप्रस्थानानि । अन्येषामप्येकदेशिनामेतेष्वेवान्तर्भावात् ।
ननु नास्तिकानामपि प्रस्थानान्तराणि सन्ति तान्येतेष्वनन्तर्भावा-त्पृथमार्गावतुमुचितानि । तथाहि - शून्यवादेनैकं प्रस्थानं माध्यमिकानाम् । क्षणिकविज्ञानमात्रवादेनान्यद्योगाचाराणाम् । ज्ञानाकारानुमेयक्षणिक-बाह्यार्थवादेनापरं सौत्रान्तिकानाम् । प्रत्यक्षसलक्षणक्षणिकबाह्यार्थ-वादेनापरं वैभाषिकाणाम्। एवं सौगतानां प्रस्थानचतुष्टयम् । तथा देहात्मवादेनैकं प्रस्थानं चार्वाकाणाम्। एवं देहातिरिक्तदेहपरिमाणात्मवादेन द्वितीयं प्रस्थानं दिगम्बराणाम्। एवं मिलित्वा नास्तिकानां षट् प्रस्थानानि, तानि कस्मान्नोच्यन्ते ।
Hindi Translation
साक्षात् या परम्परा सम्बन्ध से सभी शास्त्रों का भगवान् में ही तात्पर्य है अर्थात् सभी शास्त्रों का भगवत्-तत्त्व-प्रतिपादन ही लक्ष्य है। अनेक ऋषि-मुनियों के अनुभव ही शास्त्र है। मुनियों के अनेक होने के कारण शास्त्र भी अनेक हो गये। उन्हीं अनुभूत निबन्धों को प्रस्थान भी कहते हैं। उन प्रस्थानों का संक्षेप रूप से नाम-निर्देश के द्वारा कथन किया जा रहा है। वह इस प्रकार है--
वेद चार हैं--ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। उनके छः अङ्ग हैं--शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष। चार उपांग हैं--पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र। उपपुराण भी हैं, उनका पुराणों में ही अन्तर्भाव है। इसी प्रकार वैशेषिक शास्त्र का न्याय में, वेदान्तशास्त्र का मीमांसा में, महाभारत, रामायण, सांख्य, पातञ्जल (योग), पाशुपत, वैष्णव आदि शास्त्रों का धर्मशास्त्र में अन्तर्भाव होता है। सभी मिलकर चौदह विद्याएँ होती हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है- पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, और छः अङ्गों के साथ चारों वेद, विद्याओं तथा धर्म के चौदह स्थान हैं। चार उपवेदों के सहित यही अट्ठारह विद्याएँ होती है। चार उपवेद ये हैं- आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र। सभी आस्तिकों के लिये इतने ही शास्त्रप्रस्थान हैं। अन्य कुछ एकदेशी प्रस्थानों का भी इन्हीं में अन्तर्भाव हो जाता है। प्रश्न- नास्तिकों के भी भिन्न-भिन्न शास्त्रप्रस्थान हैं। उनका इन प्रस्थानों में अन्तर्भाव नहीं हो सकता है। अतः उनकी पृथक् गणना होनी चाहिए। यथा- माध्यमिकों का शून्यवाद के नाम से एक प्रस्थान प्रसिद्ध है। योगाचार का क्षणिक विज्ञानवाद प्रस्थान है।
सौत्रान्त्रिक ज्ञान के आकार से अनुमेय क्षणिक बाह्यार्थ मानते हैं। इसलिये इनका क्षणिक बाह्यार्थवाद प्रस्थान कहलाता है। वैभाषिक अनुमेय न मानकर प्रत्यक्ष सलक्षण क्षणिक बाह्यार्थ मानते हैं। अतः इनका प्रस्थान प्रत्यक्ष सलक्षण बाह्यार्थवाद के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार बौद्धों के चार प्रस्थान है। चार्वाक देह को ही आत्मा मानता है। इसलिये इनका देहात्मवाद प्रस्थान कहलाता है। जैन आचार्य आत्मा को देह से मिन्न मानते हैं, किन्तु देह के परिमाण के बराबर ही आत्मा का परिमाण मानते हैं। इसलिये इनके प्रस्थान को देहपरिमाणात्मवाद कहते है। इस प्रकार सभी मिलकर नास्तिकों के भी छः प्रस्थान होते हैं। इन प्रस्यानों की गणना क्यों नहीं की गयी ?
वेद चार हैं--ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। उनके छः अङ्ग हैं--शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द और ज्योतिष। चार उपांग हैं--पुराण, न्याय, मीमांसा और धर्मशास्त्र। उपपुराण भी हैं, उनका पुराणों में ही अन्तर्भाव है। इसी प्रकार वैशेषिक शास्त्र का न्याय में, वेदान्तशास्त्र का मीमांसा में, महाभारत, रामायण, सांख्य, पातञ्जल (योग), पाशुपत, वैष्णव आदि शास्त्रों का धर्मशास्त्र में अन्तर्भाव होता है। सभी मिलकर चौदह विद्याएँ होती हैं। महर्षि याज्ञवल्क्य ने कहा है- पुराण, न्याय, मीमांसा, धर्मशास्त्र, और छः अङ्गों के साथ चारों वेद, विद्याओं तथा धर्म के चौदह स्थान हैं। चार उपवेदों के सहित यही अट्ठारह विद्याएँ होती है। चार उपवेद ये हैं- आयुर्वेद, धनुर्वेद, गान्धर्ववेद और अर्थशास्त्र। सभी आस्तिकों के लिये इतने ही शास्त्रप्रस्थान हैं। अन्य कुछ एकदेशी प्रस्थानों का भी इन्हीं में अन्तर्भाव हो जाता है। प्रश्न- नास्तिकों के भी भिन्न-भिन्न शास्त्रप्रस्थान हैं। उनका इन प्रस्थानों में अन्तर्भाव नहीं हो सकता है। अतः उनकी पृथक् गणना होनी चाहिए। यथा- माध्यमिकों का शून्यवाद के नाम से एक प्रस्थान प्रसिद्ध है। योगाचार का क्षणिक विज्ञानवाद प्रस्थान है।
सौत्रान्त्रिक ज्ञान के आकार से अनुमेय क्षणिक बाह्यार्थ मानते हैं। इसलिये इनका क्षणिक बाह्यार्थवाद प्रस्थान कहलाता है। वैभाषिक अनुमेय न मानकर प्रत्यक्ष सलक्षण क्षणिक बाह्यार्थ मानते हैं। अतः इनका प्रस्थान प्रत्यक्ष सलक्षण बाह्यार्थवाद के नाम से प्रसिद्ध है। इस प्रकार बौद्धों के चार प्रस्थान है। चार्वाक देह को ही आत्मा मानता है। इसलिये इनका देहात्मवाद प्रस्थान कहलाता है। जैन आचार्य आत्मा को देह से मिन्न मानते हैं, किन्तु देह के परिमाण के बराबर ही आत्मा का परिमाण मानते हैं। इसलिये इनके प्रस्थान को देहपरिमाणात्मवाद कहते है। इस प्रकार सभी मिलकर नास्तिकों के भी छः प्रस्थान होते हैं। इन प्रस्यानों की गणना क्यों नहीं की गयी ?
⬥ ग्रन्थ 3 ⬥
मूलम् | Original Text
सत्यम् । वेदबाह्यत्वात्तेषां म्लेच्छादिप्रस्थानवत्परम्परयाऽपि पुरुषार्थानुपयोगित्वादुपेक्षणीयत्वमेव । इह तु साक्षाद्वा परम्परया वा पुमर्थोपयोगिनां वेदोपकरणानामेव प्रस्थानानां भेदो दशितः ततो न न्यूनत्वशङ्कावकाशः । अथ संक्षेपेणैषां प्रस्थानानां स्वरूपभेदहेतुप्रयोजनभेद उच्यते बालानां व्युत्पत्तये ।
तत्र धर्मब्रह्मप्रतिपादकमपौरुषेयं प्रमाणवावयं वेदः। स च मन्त्र ब्राह्मणात्मकः । तत्र मन्त्रा अनुष्ठानकारकभूतद्रव्यदेवताप्रकाशकाः । तेऽपि त्रिविधाः । ऋग्यजुः सामभेदात्। तत्र पादबद्धगायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टा ऋचः "अग्निमीडे पुरोहितम्" इत्याद्याः। ता एव गीतिविशिष्टाः सामानि । तदुभयविलक्षणानि यजूंषि । अग्नीदग्नीन्विहरेत्यादिसम्बोधनरुपा निगद-मन्त्रा अपि यजुरन्तर्भूता एव । तदेवं निरुपिता मन्त्राः
ब्राह्मणमपि त्रिविधम् । विधिरुपमर्थवादरूपं तदुभयविलक्षणरुपं च। तत्र शब्दभावना विधिरिति भाट्टाः। नियोगो विधिरिति प्राभाकराः । इष्टसाधनता विधिरिति तार्किकादयः सर्वे। विधिरपि चतुर्विधः । उत्पत्य-धिकारविनियोगप्रयोगभेदात्। तत्र कर्मस्वरुपमात्रबोधको विधिरुत्पत्ति-विधिराग्नेयोऽष्टाकपालो भवतीत्यादिः । सेतिकर्त्तव्यताकस्य करणस्य यागादेः फलसम्बन्धबोधको विधिरधिकारविधिर्दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेत्यादिः ।
तत्र धर्मब्रह्मप्रतिपादकमपौरुषेयं प्रमाणवावयं वेदः। स च मन्त्र ब्राह्मणात्मकः । तत्र मन्त्रा अनुष्ठानकारकभूतद्रव्यदेवताप्रकाशकाः । तेऽपि त्रिविधाः । ऋग्यजुः सामभेदात्। तत्र पादबद्धगायत्र्यादिच्छन्दोविशिष्टा ऋचः "अग्निमीडे पुरोहितम्" इत्याद्याः। ता एव गीतिविशिष्टाः सामानि । तदुभयविलक्षणानि यजूंषि । अग्नीदग्नीन्विहरेत्यादिसम्बोधनरुपा निगद-मन्त्रा अपि यजुरन्तर्भूता एव । तदेवं निरुपिता मन्त्राः
ब्राह्मणमपि त्रिविधम् । विधिरुपमर्थवादरूपं तदुभयविलक्षणरुपं च। तत्र शब्दभावना विधिरिति भाट्टाः। नियोगो विधिरिति प्राभाकराः । इष्टसाधनता विधिरिति तार्किकादयः सर्वे। विधिरपि चतुर्विधः । उत्पत्य-धिकारविनियोगप्रयोगभेदात्। तत्र कर्मस्वरुपमात्रबोधको विधिरुत्पत्ति-विधिराग्नेयोऽष्टाकपालो भवतीत्यादिः । सेतिकर्त्तव्यताकस्य करणस्य यागादेः फलसम्बन्धबोधको विधिरधिकारविधिर्दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेतेत्यादिः ।
Hindi Translation
समाधान--वे प्रस्थान वेदबाह्य है। वे वैदिक मर्यादाओं तथा वेदों पर सष्ठन करते हैं। म्लेच्यादि के प्रस्थानों के समान परम्परया भी पुरुषार्य के उपयोगी नहीं हैं। इसलिये वे उपेक्षगीय है, गणना के योग्य नहीं है। इस ग्रन्थ में साशाद या परम्परा सम्बन्ध से पुरुषार्थीपयोगी तथा वेदानुवारी वा वेदोप-कारक प्रस्थानों का ही भेद प्रदर्शित किया गया है। इसलिये न्यूनता भी आशंका नहीं करनी चाहिए। इसके पश्चात् बालकों के ज्ञान के लिये इन प्रस्थानों का स्वरूप, परस्पर भेद का कारण और सबों के प्रयोजन-भेद का प्रतिपादन किया जा रहा है।
सर्वप्रथम वेद का लक्षण प्रस्तुत करते हैं- धर्म और ब्रह्म के प्रतिपादक अपौरुषेय प्रमाणवाक्य को वेद कहते हैं। वह मन्त्रब्राह्मणातमक है अर्थात् मन्त्र और ब्राह्मण मिल कर वेदपदवाच्य होता है। अनुष्ठान के सम्पादक द्रव्य और देवता का प्रकाशक मन्त्र होता है। यह तीन प्रकार का है--ऋक्, यजुः और साम। उसमें पादबद्ध गायत्री आदि छन्दों से युक्त मन्त्र ऋक् कहलाता है। यथा-'अग्निमीले पुरोहित०' इत्यादि। गीति से युक्त ऋचाओं को साम कहते हैं। इन दोनों से भिन्न मन्त्रों को यजुः कहते हैं। 'अग्नीदनीन् विहर' इत्यादि सम्बोधन रुप निगद मन्त्र भी यजुः के जन्तंगत ही माने जाते है। इस प्रकार मन्त्रों का निरुपण हुआ।
ब्राह्मण का निरुपण--ब्राह्मण भी तीन प्रकार के होते हैं-विधिरूप, अर्थवाद और उभयर्विलक्षणरूप(दोनों से भिन्न)। भट्ट तथा उनके अनुयायी शाब्दी भावना को विधि मानते हैं। प्रभाकर तथा उनके अनुगामी मीमांसक नियोग को विधि मानते हैं। तार्किक (नैयायिक) आदि सभी दार्शनिक इष्ट-साधनता को विधि मानते हैं।
विधि भी चार प्रकार की होती है- उत्पत्तिविधि अधिकारविधि विनियोगविधि और प्रयोगविधि। याग आदि कर्मों के स्वरूपमात्र के बोधक विधि उत्पत्ति विधि होती है। यथा- 'आग्नेयोsष्टकपालो भवति' इत्यादि। इतिकर्त्तव्यता से युक्त करण रुप याग आदि का फल के साथ सम्बन्ध का बोधक विधि अधिकार विधि कहलाती है। यथा 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि ।
सर्वप्रथम वेद का लक्षण प्रस्तुत करते हैं- धर्म और ब्रह्म के प्रतिपादक अपौरुषेय प्रमाणवाक्य को वेद कहते हैं। वह मन्त्रब्राह्मणातमक है अर्थात् मन्त्र और ब्राह्मण मिल कर वेदपदवाच्य होता है। अनुष्ठान के सम्पादक द्रव्य और देवता का प्रकाशक मन्त्र होता है। यह तीन प्रकार का है--ऋक्, यजुः और साम। उसमें पादबद्ध गायत्री आदि छन्दों से युक्त मन्त्र ऋक् कहलाता है। यथा-'अग्निमीले पुरोहित०' इत्यादि। गीति से युक्त ऋचाओं को साम कहते हैं। इन दोनों से भिन्न मन्त्रों को यजुः कहते हैं। 'अग्नीदनीन् विहर' इत्यादि सम्बोधन रुप निगद मन्त्र भी यजुः के जन्तंगत ही माने जाते है। इस प्रकार मन्त्रों का निरुपण हुआ।
ब्राह्मण का निरुपण--ब्राह्मण भी तीन प्रकार के होते हैं-विधिरूप, अर्थवाद और उभयर्विलक्षणरूप(दोनों से भिन्न)। भट्ट तथा उनके अनुयायी शाब्दी भावना को विधि मानते हैं। प्रभाकर तथा उनके अनुगामी मीमांसक नियोग को विधि मानते हैं। तार्किक (नैयायिक) आदि सभी दार्शनिक इष्ट-साधनता को विधि मानते हैं।
विधि भी चार प्रकार की होती है- उत्पत्तिविधि अधिकारविधि विनियोगविधि और प्रयोगविधि। याग आदि कर्मों के स्वरूपमात्र के बोधक विधि उत्पत्ति विधि होती है। यथा- 'आग्नेयोsष्टकपालो भवति' इत्यादि। इतिकर्त्तव्यता से युक्त करण रुप याग आदि का फल के साथ सम्बन्ध का बोधक विधि अधिकार विधि कहलाती है। यथा 'दर्शपूर्णमासाभ्यां स्वर्गकामो यजेत' इत्यादि ।
⬥ ग्रन्थ 4 ⬥
मूलम् | Original Text
अङ्गसम्बन्धबोधकोविधिर्विनियोगविधिर्व्रीहिभिर्यजेत समिधो यजतीत्यादिः । साङ्गप्रधानकर्मप्रयोगैक्यबोधकः पूर्वोक्तविधित्रेयमेलनरूपः प्रयोगविधिः । स च श्रौत इत्येके । कल्प्य इत्यपरे। कर्मस्वरूपं च द्विविधम् । गुणकर्मार्थकर्मं च। तत्र क्रतुकर्मकारकाण्याश्रित्य विहितं गुणकर्म। तदपि चतुर्विधम् । उत्पत्त्याप्यविकृतिसंस्कृतिभेदात्। तत्र वसन्ते ब्राह्मणोऽग्नीनादधीत, यूपं तक्षतीत्यादावावानतक्षणादिना संस्कारविशेषविशिष्टान्नियूपादेरुत्पत्तिः । स्वाध्यायोऽध्येतव्यो गां पयो दोग्धीत्यादावध्ययनदोहनादिना विद्यमानस्यैव स्वाध्यायपयः प्रभृतेः प्रातिः। सोम॑मभिषुणोति व्रीहीनवहन्त्याज्यं विलापयतीत्यादावभिषवावघातविस्थापनः सोमादीनां विकारः। व्रीहीन्प्रोक्षति पत्न्यवेक्षत इत्यादौ प्रोक्षणावेक्षणादिभिर्वीह्यादि द्रव्याणां संस्कारः। एतच्चतुष्टयं चाङ्गमेव । तया क्रतुकारकाण्याश्रित्य विहितमर्थकर्म च द्विविधम् । अङ्गं प्रधानं च। अन्यार्थमङ्गम् । अनन्यार्थं प्रधानम्। अङ्गमपि द्विविधm। संनिपत्योपकारकमारादुपकारकं च। तत्र प्रधान स्वरुपनिर्वाहकं प्रथमम् । फलोपकारि द्वितीयम्। एवं संपूर्णाङ्गसहितो विधिः प्रकृतिः। विकलाङ्गसंयुक्तो विधिविकृतिः । तदुभयविलक्षणो विधिर्दविहोमः। एवमन्यदप्यूह्यम्। तदेवं निरुपितो विविभागः ।
प्राशस्त्वनिन्दान्यतरलक्षणया विधिशेषभूतं वाक्यमर्थवादः। स च त्रिविधः । गुणवादोऽनुवादो भूतार्यवादश्चेति । तत्र प्रमाणान्तरविरुद्धार्य-बोधको गुणवाद...
प्राशस्त्वनिन्दान्यतरलक्षणया विधिशेषभूतं वाक्यमर्थवादः। स च त्रिविधः । गुणवादोऽनुवादो भूतार्यवादश्चेति । तत्र प्रमाणान्तरविरुद्धार्य-बोधको गुणवाद...
Hindi Translation
अंगों का प्रधान के साथ सम्बन्ध का बोध कराने वाली विधि को विनियोग विधि कहते हैं, जैसे- 'व्रीहिभिर्यजेत' 'समिधो यजति' इत्यादि ।
अंगों के सहित प्रधान कर्म के प्रयोग की एकता का बोधक अर्थात् पूर्वोत तीनों विधियों के सम्मेलन रूप प्रयोग विधि वलाती है। कुछ लोग उसको श्रौत मानते हैं तथा कुछ विद्वान् कल्प्य भी मानते हैं। कर्म का स्वरूप दो प्रकार का होता है-गुणकर्म और अर्थकर्म। याग आदि कर्मों के सम्पादक पदार्थों का आश्रयण करके विहित कर्म गुणकर्म कहलाता है। वे गुणकर्म भी चार प्रकार के होते हैं- उत्पत्ति, आप्य , विकृति मौर संस्कृति । "वसन्ते ब्राह्मणो अग्नीनादधीत' 'यूपं तक्षति' इत्यादि में आधान और तक्षण के द्वारा संस्कार विशेष से विशिष्ट अग्नि तथा यूप आदि की उत्पत्ति होती है। 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' 'गां पयो दोग्धि' इत्यादि स्थलों में अध्ययन तथा दोहनादि के द्वारा पूर्व से विद्यमान स्वाध्याय तथा दुग्ध आदि की प्राप्ति होती है। 'सोममभिषुणोति' 'व्रीहीनवहन्ति' 'आज्यं विलापयति' इत्यादि में अभिषव, अवघात तथा विलापन के द्वारा सोमादि पदार्थों में विकार उत्पन्न है। 'व्रीहीन् प्रोक्षति' 'पत्यवेक्षते' इत्यादि में प्रोक्षण तथा अवेक्षण आदि के द्वारा व्रीहि आदि द्रव्यों का संस्कार होता है। ये चारी अङ्ग ही है, अङ्गी नहीं।
क्रतु के सम्पादक द्रव्यों का आश्रयण करके विहित कर्म अर्थकर्म कहलाता है बौर वह दो प्रकार का होता है- अङ्ग और प्रधान। जो दूसरे के लिये अर्थात् दूसरे का उपकारक होता है, वह अङ्ग कहलाता है और जो दूसरे के उपकारक नहीं होता है, वही प्रधान है। अङ्ग भी दो प्रकार का है - सन्निपत्योपकारक और आरादुपकारक। प्रधान याग के स्वरुप का संपादक सन्निपत्योपकारक होता है और फल का उपकारक आरादुपकारक होता है। इन सभी अङ्गों के सहित जिसका विधान हो, वह प्रकृति और जिसमें सभी अङ्गों पर विधान नहीं होता, अपितु विशेष अङ्गों का ही विधान होता है, यह विकृति बहलाती है। इन दोनों से भिन्न विधि दविहोम आदि है। इसी प्रकार दूसरे का भी ऊह करना चाहिए। इस प्रकार विधिभाग का निरुपण समाप्त हुआ ।
अर्थवाद निरूपण- प्राशस्त्य और निन्दा में से किसी एक के वाचक विधि के शेषभूत वाक्य को अर्थवाद कहते हैं। वे तीन प्रकार के हैं - गुणवाद , अनुवाद और भूतार्थवाद । प्रत्यक्ष आदि दूसरे प्रमाणों से विरुद्ध अर्थ का बोधक गुणवाद होता है।
अंगों के सहित प्रधान कर्म के प्रयोग की एकता का बोधक अर्थात् पूर्वोत तीनों विधियों के सम्मेलन रूप प्रयोग विधि वलाती है। कुछ लोग उसको श्रौत मानते हैं तथा कुछ विद्वान् कल्प्य भी मानते हैं। कर्म का स्वरूप दो प्रकार का होता है-गुणकर्म और अर्थकर्म। याग आदि कर्मों के सम्पादक पदार्थों का आश्रयण करके विहित कर्म गुणकर्म कहलाता है। वे गुणकर्म भी चार प्रकार के होते हैं- उत्पत्ति, आप्य , विकृति मौर संस्कृति । "वसन्ते ब्राह्मणो अग्नीनादधीत' 'यूपं तक्षति' इत्यादि में आधान और तक्षण के द्वारा संस्कार विशेष से विशिष्ट अग्नि तथा यूप आदि की उत्पत्ति होती है। 'स्वाध्यायोऽध्येतव्यः' 'गां पयो दोग्धि' इत्यादि स्थलों में अध्ययन तथा दोहनादि के द्वारा पूर्व से विद्यमान स्वाध्याय तथा दुग्ध आदि की प्राप्ति होती है। 'सोममभिषुणोति' 'व्रीहीनवहन्ति' 'आज्यं विलापयति' इत्यादि में अभिषव, अवघात तथा विलापन के द्वारा सोमादि पदार्थों में विकार उत्पन्न है। 'व्रीहीन् प्रोक्षति' 'पत्यवेक्षते' इत्यादि में प्रोक्षण तथा अवेक्षण आदि के द्वारा व्रीहि आदि द्रव्यों का संस्कार होता है। ये चारी अङ्ग ही है, अङ्गी नहीं।
क्रतु के सम्पादक द्रव्यों का आश्रयण करके विहित कर्म अर्थकर्म कहलाता है बौर वह दो प्रकार का होता है- अङ्ग और प्रधान। जो दूसरे के लिये अर्थात् दूसरे का उपकारक होता है, वह अङ्ग कहलाता है और जो दूसरे के उपकारक नहीं होता है, वही प्रधान है। अङ्ग भी दो प्रकार का है - सन्निपत्योपकारक और आरादुपकारक। प्रधान याग के स्वरुप का संपादक सन्निपत्योपकारक होता है और फल का उपकारक आरादुपकारक होता है। इन सभी अङ्गों के सहित जिसका विधान हो, वह प्रकृति और जिसमें सभी अङ्गों पर विधान नहीं होता, अपितु विशेष अङ्गों का ही विधान होता है, यह विकृति बहलाती है। इन दोनों से भिन्न विधि दविहोम आदि है। इसी प्रकार दूसरे का भी ऊह करना चाहिए। इस प्रकार विधिभाग का निरुपण समाप्त हुआ ।
अर्थवाद निरूपण- प्राशस्त्य और निन्दा में से किसी एक के वाचक विधि के शेषभूत वाक्य को अर्थवाद कहते हैं। वे तीन प्रकार के हैं - गुणवाद , अनुवाद और भूतार्थवाद । प्रत्यक्ष आदि दूसरे प्रमाणों से विरुद्ध अर्थ का बोधक गुणवाद होता है।
⬥ ग्रन्थ 5 ⬥
मूलम् | Original Text
आदित्यो यूप इत्यादिः । प्रमाणान्तरप्राप्त्यर्थबोधकोऽनुवादो ऽग्निर्हिमस्य भेषजभित्यादिः। प्रमाणान्तरविरोधतत्प्राप्तिरहितार्य बोधको भूतार्थवादः । इन्द्रोवृत्राय वज्रमुदयच्छदित्यादिः। तदुक्तम्-
विरोधे गुणवादः स्यावनुवादोऽवधारिते ।
भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मतः ॥ इति ।
तत्र त्रिविधानामप्यर्थवादानां विधिस्तुतिपरत्वे समानेऽपि भूतार्थ-वादानां स्वार्थेऽपि प्रामाण्यं देवताधिकरणन्यायात् । अबाधिताज्ञातज्ञापकत्वं हि प्रामाण्यम् । तच्चाबाधितविषयत्वाज्ज्ञापकत्वाच्च न गुणवादानु वादयोः। भूतार्थस्य तु स्वार्थे तात्पर्यरहितस्याप्यौत्सर्गिकं प्रामाण्यं न विहन्यते । तदेवं निरुपितोऽर्थवादभागः ।
विरोधे गुणवादः स्यावनुवादोऽवधारिते ।
भूतार्थवादस्तद्धानादर्थवादस्त्रिधा मतः ॥ इति ।
तत्र त्रिविधानामप्यर्थवादानां विधिस्तुतिपरत्वे समानेऽपि भूतार्थ-वादानां स्वार्थेऽपि प्रामाण्यं देवताधिकरणन्यायात् । अबाधिताज्ञातज्ञापकत्वं हि प्रामाण्यम् । तच्चाबाधितविषयत्वाज्ज्ञापकत्वाच्च न गुणवादानु वादयोः। भूतार्थस्य तु स्वार्थे तात्पर्यरहितस्याप्यौत्सर्गिकं प्रामाण्यं न विहन्यते । तदेवं निरुपितोऽर्थवादभागः ।
Hindi Translation
जैसे-'आदित्यो यूपः' इत्यादि। यहाँ पर यूप को आदित्य कहा गया है, किन्तु यूप में आदित्यत्व प्रत्यक्ष प्रमाण से बाधित है। अतः गुणवाद माना जाता है। प्रमाणान्तर से ज्ञात अर्थ के बोधक अर्थवाद को अनुवाद कहते हैं, जैसे-'अग्निर्हिमस्य भेषजम्' इत्यादि। अग्नि को उष्ण होने के कारण उसमें शीतलता दूर करने की शक्ति प्रत्यक्ष प्रमाण से सिद्ध है। अत वह वाक्य अनुवादक माना जाता है। प्रमाणान्तर के साथ विरोध और उसके प्राप्ति से रहित अर्थ के बोधक अर्थवाद भूतार्थवाद कहलाता है। जैसे 'इन्द्रो वृत्राय वज्रमुदयच्छत् इत्यादि । कहा भी है- अर्थवाद तीन प्रकार का होता है, विरोध रहने पर गुणवाद, निश्चित पदार्थ के प्रतिपादक रहने पर अनुवाद और उसकी हानि होने से भूतार्थवाद होता है। तीनों प्रकार के अर्थवाद समान रूप से विधि के स्तावक होते हैं तथापि देवताधिकरण-न्याय से भूतार्थवादों का अपने अर्थ के प्रतिपादकता में प्रामाण्य रहता है अर्थात् वह अपने अर्थ का भी प्रतिपादक होता है। अबाधित और अज्ञात अर्ग का ज्ञापकत्व=बोधकत्व ही प्रामाण्य है। बाधितविषयक और ज्ञात अर्थ का बोधक होने के कारण गुणवाद और अनुवाद का स्वार्थ में प्रामाण्य नहीं होता। भूतार्थवाद का स्वार्थ में तात्पर्य न रहने पर भी स्वाभाविक प्रामाण्य का विघात=विनाश नहीं होता। इस प्रकार अर्थवाद भाग का निरुपण हुआ ।
⬥ ग्रन्थ 6 ⬥
मूलम् | Original Text
विध्यर्थवादोभयविलक्षणं तु वेदान्तवाक्यम् । तच्चाज्ञातज्ञापकत्वे-ऽप्यनुष्ठानाप्रतिपादकत्वान्न विधिः । स्वतः पुरुषार्थपरमानन्दज्ञानात्मक-ब्रह्मणि स्वार्थ उपक्रमोपसंहारादिषड्विधतात्पर्यलिङ्गबत्तया स्वतः प्रमाणभूतं सर्वानपि विधीनन्तःकरणशुद्धिद्वारा स्वविशेषतामापादयदन्य-शेषत्वाभावाच्च । तस्मादुभयविलक्षणमेव वेदान्तवाक्यम् । तच्च क्वचिदज्ञातज्ञापकत्वमात्रेण विधिरिति व्यपदिश्यते । क्वचिद्विधिपद-रहितप्रमाणवाक्येन भूतार्थवाद इति व्यवह्रियत इति न दोषः। तदेवं निरुपितं त्रिविधं ब्राह्मणम् ।
Hindi Translation
वेदान्त वाक्य--विधि और अर्थवाद दोनों से विलक्षण वेदान्त वाक्य होता है। वेदान्त वाक्य अज्ञात का ज्ञापक होता है, तथापि क्रिया के अनुष्ठान का प्रतिपादक न होने के कारण विधि नहीं है।
दूसरी बात यह है कि वेदान्त वाक्यों का स्वतः पुरुषार्थ स्वरूप परमानन्दात्मक बौर ज्ञानात्मक ब्रह्म में तात्पर्य होता है। उपक्रमोपसंहार आदि छः प्रकार के तात्पर्य बोधक प्रमाणों के द्वारा वह स्वतः प्रमाणभूत होता है। सभी विधियों का अन्तःकरण की शुद्धि के द्वारा अपनी विशेषता का आपादन करते हुए किसी का शेष न होने के कारण भी विधि नहीं कहा जा सकता है। इसलिये दोनों से विलक्षण ही वेदान्तवाक्य है। कहीं-कहीं पर केवल अज्ञात अर्थ के ज्ञापक होने के कारण विधि शब्द से भी व्यवहार किया जाता है। कहीं पर विधि पद से रहित प्रमाणवाक्य होने के कारण भूतार्थवाद भी कहा जाता है। अतः इसमें कोई दोष नहीं है। इस प्रकार तीनों प्रकार के ब्राह्मणों का निश्पण समाप्त हुआ ।
दूसरी बात यह है कि वेदान्त वाक्यों का स्वतः पुरुषार्थ स्वरूप परमानन्दात्मक बौर ज्ञानात्मक ब्रह्म में तात्पर्य होता है। उपक्रमोपसंहार आदि छः प्रकार के तात्पर्य बोधक प्रमाणों के द्वारा वह स्वतः प्रमाणभूत होता है। सभी विधियों का अन्तःकरण की शुद्धि के द्वारा अपनी विशेषता का आपादन करते हुए किसी का शेष न होने के कारण भी विधि नहीं कहा जा सकता है। इसलिये दोनों से विलक्षण ही वेदान्तवाक्य है। कहीं-कहीं पर केवल अज्ञात अर्थ के ज्ञापक होने के कारण विधि शब्द से भी व्यवहार किया जाता है। कहीं पर विधि पद से रहित प्रमाणवाक्य होने के कारण भूतार्थवाद भी कहा जाता है। अतः इसमें कोई दोष नहीं है। इस प्रकार तीनों प्रकार के ब्राह्मणों का निश्पण समाप्त हुआ ।
⬥ ग्रन्थ 7 ⬥
मूलम् | Original Text
एवञ्च कर्मकाण्डब्रह्मकाण्डात्मको वेदो धर्मार्थकाममोक्षहेतुः। स च प्रयोगत्रयेण यज्ञनिर्वाहार्थमृग्यजुः सामभेदेन भिन्नः । तत्र होत्रप्रयोग ऋग्वेदेन, आध्वर्यवप्रयोगो यजुर्वेदेन, औद्द्यात्रप्रयोगः सामवेदेन । ब्राह्मयाजमानप्रयोगौ त्वत्रैवान्तर्भूतौ। अथर्ववेदस्तु यज्ञानुपयुक्तः शान्तिक-पौष्टिकाभिचारादिकर्मप्रतिपादकत्वेनात्यन्तविलक्षण एव । एवं प्रवचनभेदात् प्रतिवेदं भिन्ना भूयस्यः शाखाः । एवञ्च कर्मकाण्डे व्यापारभेदेऽपि सर्वासां वेदशाखानामेकरूपत्वमेव ब्रह्मकाण्डे। इति चतुर्णां वेदानां प्रयोजनभेदेन भेद उक्तः । अथाङ्गानां प्रयोजनमुच्यते। तत्र शिक्षाया उदात्तानुदात्तस्वरित-ह्रस्वदीर्घप्लुतादिविशिष्टस्वरव्यञ्जनात्मकवर्णोच्चारविशेषज्ञानं प्रयोजनम्। तदभावे मन्त्राणामनर्थकत्वात्। तथा चोक्तम्-
मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपरावात् ॥ (शि० ५२) इति ।
मन्त्रो हीनः स्वरतो वर्णतो वा मिथ्याप्रयुक्तो न तमर्थमाह ।
स वाग्वज्रो यजमानं हिनस्ति यथेन्द्रशत्रुः स्वरतोऽपरावात् ॥ (शि० ५२) इति ।
Hindi Translation
ये कर्मकाण्ड ब्रह्मकाण्डात्मक वेद धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के हेतु हैं। वेद तीन प्रकार के प्रयोगों के द्वारा यज्ञों के निर्वाह के लिये ऋक् , यजुः और साम के भेद से भिन्न है। उन में ऋग्वेद के द्वारा हौत्र प्रयोग, यजुर्वेद के द्वारा आध्वर्यव प्रयोग और सामवेद के द्वारा औद्गात्र प्रयोग सम्पन्न होता है। ब्राह्म और याजमान प्रयोग इन्हीं में अन्तर्भूत हैं। अथर्ववेद यज्ञ के उपयोगी नहीं है और शान्तिक, पौष्टिक तथा अभिचार आदि कर्मों के प्रतिपादक होने के कारण अत्यन्त विलक्षण ही है। इसीप्रकार प्रवचन के भेद से प्रत्येक वेदों की भिन्न-भिन्न अनेक शाखाएँ हैं। कर्मकाण्ड भाग में व्यापार के भेद से वेदों की भिन्नता रहने पर भी बह्मकाण्ड में सभी शाखाओं की एकरुपता ही रहती है। इस प्रकार चारों वेदों के प्रयोजन के भेद से भेद का प्रतिपादन किया गया।
अब अङ्गों के प्रयोजन का निरुपण करते हैं।
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत आदि से युक्त स्वर व्यञ्जनात्मक वर्णों के उच्चारण का विशेष ज्ञान शिक्षा का प्रयोजन है। इसके अभाव में मन्त्र अनर्थक=विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक हो जायेंगे। कहा भी है-स्वर या वर्ण से हीन मन्त्र का प्रयोग व्यर्थ है, क्योंकि जिस प्रयोजन के लिये उसका प्रयोग किया जाता है, उस प्रयोजन को वह पूर्ण नहीं कर सकता। वह वाणी ही वज्र बन जाती है और यजमान की हिंसा कर देती है। इन्द्रशत्रु (वृत्र) का स्वर के अपराध से ही नाश हो गया था।
अब अङ्गों के प्रयोजन का निरुपण करते हैं।
उदात्त, अनुदात्त, स्वरित, ह्रस्व, दीर्घ और प्लुत आदि से युक्त स्वर व्यञ्जनात्मक वर्णों के उच्चारण का विशेष ज्ञान शिक्षा का प्रयोजन है। इसके अभाव में मन्त्र अनर्थक=विरुद्ध अर्थ के प्रतिपादक हो जायेंगे। कहा भी है-स्वर या वर्ण से हीन मन्त्र का प्रयोग व्यर्थ है, क्योंकि जिस प्रयोजन के लिये उसका प्रयोग किया जाता है, उस प्रयोजन को वह पूर्ण नहीं कर सकता। वह वाणी ही वज्र बन जाती है और यजमान की हिंसा कर देती है। इन्द्रशत्रु (वृत्र) का स्वर के अपराध से ही नाश हो गया था।
⬥ ग्रन्थ 8 ⬥
मूलम् | Original Text
तत्र सर्ववेदसाधारणी शिक्षा अथ शिक्षां प्रवक्ष्यामीत्यादिपञ्चखण्डात्मिका पाणिनिना प्रकाशिता । प्रतिवेदशाखं च भिन्नरुपा प्रातिशख्यसंज्ञिता-ऽन्यैरेवमुनिभिः प्रदर्शिता। एवं वैदिकपदसाधुत्वज्ञानेनोहादिकं व्याकरणस्य प्रयोजनम्। तच्च वृद्धिरादैजित्याद्यध्यायाष्टकात्मकं महेश्वरप्रसादेन भगवता पाणिनिनैव विरचितम्। पाणिनीयसूत्रेषु कात्यायनेन मुनिना वार्त्तिकं विरचितम् । तद्वार्त्तिकस्योपरि च भगवता पतञ्जलिना महाभाष्यमारचि। तदेतत्त्रिमुनि व्याकरणं वेदाङ्गं माहेश्वरमित्याख्यायते । कौमारादिव्याकरणानि तु न वेदाङ्गानि किन्तु लौकिकप्रयोगमात्रज्ञानार्था-नीत्यवगन्तव्यम् । एवं शिक्षाव्याकरणाभ्यां वर्णोच्चारणपदसाधुत्वे ज्ञाते वैदिकमन्त्रपदानामर्थज्ञानाकाङ्क्षायां तदर्थं भगवता यास्केन समाम्नायः समाम्नातः, स व्याख्यातव्य इत्यादित्रयोदशाध्यायात्मकं निरुक्तमारचितम् तत्र च नामाख्यातनिपातोपसर्गभेदेन चतुर्विधं पदजातं निरुप्य वैदिक-मन्त्रपदार्थानामर्थः प्रकाशितः। मन्त्राणां चानुष्ठेयार्थप्रकाशनद्वारेणैव करणत्वात्पदार्थज्ञानाधीनत्वाच्च वाकयार्थज्ञानस्य मन्त्रस्थपदार्थज्ञानाय निरुक्तमवश्यमपेक्षितम् । अन्यथानुष्ठानाऽसम्भवात्। सृण्येव जर्फरी तुर्फरी तू इत्यादिदुरुहाणां शब्दनां (निरु० १३-५) प्रकारान्तरेणार्थज्ञानस्या-सम्भवनीयत्वाच्च । एवं निघण्टवोऽपि वैदिकद्रव्यदेवतात्मकपदार्थ-पर्यायशब्दात्मका निरुक्तान्तर्भूता एव । तत्रापि निघण्टु संज्ञकः पञ्चा-ध्यायात्मको ग्रन्थो भगवता यास्केनैव कृतः ।
एवमृङ्मन्त्राणां पादबद्धच्छन्दोविशेषविशिष्टत्वात्तदज्ञाने च निन्दा-श्रवणाच्छन्दोविशेषनिमित्तानुष्ठानविशेषविधानाच्च । छन्दोज्ञानाकाङ्क्षायां तत्प्रकाशनाय धीः श्रोः स्त्रीमित्याद्यष्टाध्यायात्मिका छन्दो-विवृतिर्भगवता पिङ्गलेन विरचिता। तत्राप्यलौकिकमित्यन्तेनाध्यायत्रयेण गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती पङ्क्तिस्त्रिष्टुब्जगतीति सप्तच्छन्दांसि सावान्तर-भेदानि निरुपितानि । अथ लौकिकमित्यारभ्याध्यायपञ्चकेन पुराणे-तिहासादावुपयोगीनि लौकिकानि च्छन्दांसि प्रसङ्गान्निरुपितानि व्याकरणे लौकिकपदनिरुपणवत् । एवं वैदिककर्माङ्ग दर्शादि कालज्ञानाय ज्यौतिषं भगवताऽऽदित्येन गर्गादिभिश्च प्रणीतं बहुविधमेव ।
शाखान्तरीयगुणोपसंहारेण वैदिकःनुष्ठानक्रमविशेषज्ञानाय कल्प-सूत्राणि । तानि च प्रयोगत्रयभेदात्त्रिविधानि । तत्र हौत्रप्रयोगप्रतिपाद-कान्याश्वलायन...शाङ्खायनादि प्रणीतानि ।
एवमृङ्मन्त्राणां पादबद्धच्छन्दोविशेषविशिष्टत्वात्तदज्ञाने च निन्दा-श्रवणाच्छन्दोविशेषनिमित्तानुष्ठानविशेषविधानाच्च । छन्दोज्ञानाकाङ्क्षायां तत्प्रकाशनाय धीः श्रोः स्त्रीमित्याद्यष्टाध्यायात्मिका छन्दो-विवृतिर्भगवता पिङ्गलेन विरचिता। तत्राप्यलौकिकमित्यन्तेनाध्यायत्रयेण गायत्र्युष्णिगनुष्टुब्बृहती पङ्क्तिस्त्रिष्टुब्जगतीति सप्तच्छन्दांसि सावान्तर-भेदानि निरुपितानि । अथ लौकिकमित्यारभ्याध्यायपञ्चकेन पुराणे-तिहासादावुपयोगीनि लौकिकानि च्छन्दांसि प्रसङ्गान्निरुपितानि व्याकरणे लौकिकपदनिरुपणवत् । एवं वैदिककर्माङ्ग दर्शादि कालज्ञानाय ज्यौतिषं भगवताऽऽदित्येन गर्गादिभिश्च प्रणीतं बहुविधमेव ।
शाखान्तरीयगुणोपसंहारेण वैदिकःनुष्ठानक्रमविशेषज्ञानाय कल्प-सूत्राणि । तानि च प्रयोगत्रयभेदात्त्रिविधानि । तत्र हौत्रप्रयोगप्रतिपाद-कान्याश्वलायन...शाङ्खायनादि प्रणीतानि ।
Hindi Translation
सभी वेदों के लिये शिक्षाएँ है। "अब शिक्षा का कथन करूंगा" से प्रारम्भ करके पञ्चखण्डात्मिका शिक्षा पाणिनि के द्वारा प्रकाशित है। वेदों के प्रत्येक शाखाओं में भिन्न-भिन्न रुप से प्रातिशाख्य नाम की भिन्न-भिन्न शिक्षाएँ अनेक मुनियों के द्वारा प्रदर्शित है। इस प्रकार वैदिक पदों की साधुता के ज्ञान से अन्यत्र ऊह करना ही व्याकरण का प्रयोजन है। यह व्याकरण शास्त्र "वृद्धिरादैच्" से प्रारम्भ करके आठ अध्यायों में महेश्वर के प्रसाद से मगवान् पाणिनि के द्वारा विरचित है। पाणिनि के सूत्रों के ऊपर कात्यायन मुनि ने वार्त्तिक की रचना की। उनके वार्त्तिकों के ऊपर महर्षि पतञ्जलि ने महाभाष्य की रचना की। यह त्रिमुनि व्याकरण वेदाङ्ग और महेश्वर के प्रसाद से प्राप्त होने के कारण माहेश्वर भी कहलाता है। आचार्य कौमार आदि के द्वारा विरचित व्याकरण वेदाङ्ग नहीं है, किन्तु केवल लौकिक प्रयोगों के ज्ञान के लिये ही हैं।
इस प्रकार शिक्षा और व्याकरण के द्वारा वर्णों के उच्चारण और पदों की साधुता का ज्ञान हो जाने पर वैदिक मंत्रों और पदों के अर्थ-ज्ञान की आकांक्षा होती है। उसके लिये भगवान् यास्क ने 'समाम्नायः समाम्नातः च व्याख्यातव्यः' इत्यादि से प्रारम्भ करके त्रयोदश अध्यायों में निरुक्त की रचना की। उसमें नाम, आाख्यात, उपसर्ग और निपात के भेद से चार प्रकार के पदों का निरुपण करके वैदिक मंत्रों तथा पदों के अर्थों का प्रकाशन किया। अनुष्ठेय पदार्थों का स्मरण के द्वारा ही मंत्रकरण होता है और वाक्यों के अर्थ-ज्ञान के प्रति पदों का अर्थ-ज्ञान कारण होता है। इसलिये मंत्रस्थ पदों के अर्थ-ज्ञान के लिये निरुक्त अवश्य अपेक्षित है। अन्यथा अनुष्ठान ही सम्भव नहीं होगा। 'सृण्येव जर्भरी तुर्फरी तू' इत्यादि दुरुह शब्दों का प्रकारान्तर से अर्थ-जान सम्भव नहीं है। इसी प्रकार वैदिक द्रव्य और देवतात्मक निघण्टु भी पदार्थों के पर्याय शब्दात्मक और निरुक्त के ही अन्तर्भूत है। वह पञ्चाध्यायात्मक निघण्टु नाम के ग्रन्थ भी भगवान् यास्क के द्वारा ही विरचित है।
पादबद्ध और छन्द विशेष से युक्त ऋक् मंत्र होते हैं। उन छन्दों को न जाननेवालों के लिए निन्दाश्रुत है । छन्द विशेषनिमित्तक अनुष्ठान का भी विधान है। अतः छन्द के ज्ञान की आवश्यकता होती है। भगवान् पिङ्गल में उसके ज्ञान के लिये भी 'धीः श्रीः स्त्रीम्' इत्यादि से प्रारम्भ करके आठ अध्यायों में छन्दों का विवरण प्रस्तुत किया। उसमें भी 'अलौकिकम्' इन तीन अध्यायों में अवान्तर भेदों के साथ गायत्री, उष्णिक अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुभ् और जगती छन्दों का निरुपण किया। उसके बाद 'अथ लौकिकम्' से आरम्भ करके पाँच अध्यायों में पुराण भौर इतिहास आदि के उपयोगी लौकिक छन्दों का प्रसंगतः निरुपण किया। जिस प्रकार व्याकरण में लौकिक पदों का निरुपण है, उसी प्रकार लौकिक छन्दों का भी निरुपण है। इसी प्रकार ज्योतिषशास्त्र का वैदिक कर्मों के अङ्गदर्श आदि कालों के ज्ञान के लिये भगवान् आदित्य और गर्ग आदि ऋषियों ने रचना की। यह ज्योतिषशास्त्र अनेक प्रकार के हैं।
शाखान्तरीय गुणों का उपसंहार के कारण वैदिक अनुष्ठानों के क्रमों का ज्ञान अपेक्षित है। उसके लिये कल्पसूत्र है। वे तीन प्रकार के प्रयोगों के भेद से तीन प्रकार के हैं-उनमें हौत्र प्रयोगों के प्रतिपादक आश्वलायन तथा शाङ्खायन आदि महर्षियों के द्वारा प्रणीत कल्पसूत्र हैं।
इस प्रकार शिक्षा और व्याकरण के द्वारा वर्णों के उच्चारण और पदों की साधुता का ज्ञान हो जाने पर वैदिक मंत्रों और पदों के अर्थ-ज्ञान की आकांक्षा होती है। उसके लिये भगवान् यास्क ने 'समाम्नायः समाम्नातः च व्याख्यातव्यः' इत्यादि से प्रारम्भ करके त्रयोदश अध्यायों में निरुक्त की रचना की। उसमें नाम, आाख्यात, उपसर्ग और निपात के भेद से चार प्रकार के पदों का निरुपण करके वैदिक मंत्रों तथा पदों के अर्थों का प्रकाशन किया। अनुष्ठेय पदार्थों का स्मरण के द्वारा ही मंत्रकरण होता है और वाक्यों के अर्थ-ज्ञान के प्रति पदों का अर्थ-ज्ञान कारण होता है। इसलिये मंत्रस्थ पदों के अर्थ-ज्ञान के लिये निरुक्त अवश्य अपेक्षित है। अन्यथा अनुष्ठान ही सम्भव नहीं होगा। 'सृण्येव जर्भरी तुर्फरी तू' इत्यादि दुरुह शब्दों का प्रकारान्तर से अर्थ-जान सम्भव नहीं है। इसी प्रकार वैदिक द्रव्य और देवतात्मक निघण्टु भी पदार्थों के पर्याय शब्दात्मक और निरुक्त के ही अन्तर्भूत है। वह पञ्चाध्यायात्मक निघण्टु नाम के ग्रन्थ भी भगवान् यास्क के द्वारा ही विरचित है।
पादबद्ध और छन्द विशेष से युक्त ऋक् मंत्र होते हैं। उन छन्दों को न जाननेवालों के लिए निन्दाश्रुत है । छन्द विशेषनिमित्तक अनुष्ठान का भी विधान है। अतः छन्द के ज्ञान की आवश्यकता होती है। भगवान् पिङ्गल में उसके ज्ञान के लिये भी 'धीः श्रीः स्त्रीम्' इत्यादि से प्रारम्भ करके आठ अध्यायों में छन्दों का विवरण प्रस्तुत किया। उसमें भी 'अलौकिकम्' इन तीन अध्यायों में अवान्तर भेदों के साथ गायत्री, उष्णिक अनुष्टुप, बृहती, पंक्ति, त्रिष्टुभ् और जगती छन्दों का निरुपण किया। उसके बाद 'अथ लौकिकम्' से आरम्भ करके पाँच अध्यायों में पुराण भौर इतिहास आदि के उपयोगी लौकिक छन्दों का प्रसंगतः निरुपण किया। जिस प्रकार व्याकरण में लौकिक पदों का निरुपण है, उसी प्रकार लौकिक छन्दों का भी निरुपण है। इसी प्रकार ज्योतिषशास्त्र का वैदिक कर्मों के अङ्गदर्श आदि कालों के ज्ञान के लिये भगवान् आदित्य और गर्ग आदि ऋषियों ने रचना की। यह ज्योतिषशास्त्र अनेक प्रकार के हैं।
शाखान्तरीय गुणों का उपसंहार के कारण वैदिक अनुष्ठानों के क्रमों का ज्ञान अपेक्षित है। उसके लिये कल्पसूत्र है। वे तीन प्रकार के प्रयोगों के भेद से तीन प्रकार के हैं-उनमें हौत्र प्रयोगों के प्रतिपादक आश्वलायन तथा शाङ्खायन आदि महर्षियों के द्वारा प्रणीत कल्पसूत्र हैं।
⬥ ग्रन्थ 9 ⬥
मूलम् | Original Text
आध्वर्यवप्रयोगप्रतिपादकानि बौधायनापस्तम्बकात्यायनादिप्रणीतानि । औद्गात्रप्रयोगप्रतिपादकानि लाट्यायनद्राह्यायणादिप्रणीतानि । एवं निरुपितः षण्णामङ्गानां प्रयोजनभेदः।
चतुर्णामुपाङ्गानामधुनोच्यते । तत्र सर्गप्रतिसर्गवंशमन्वन्तरवंशानु-चरितप्रतिपादकानि भगवता बादरायणेन कृतानि पुराणानि । तानि च ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं शैवं भागवतं नारदीयं मार्कण्डेयमाग्नेयं भविष्यं ब्रह्मवैवर्त्तं लैङ्गं वाराहं स्कान्दं वामनं कौर्मं मात्स्यं गारूढं ब्रह्माण्डं चेत्यष्टादश ।
आद्यं सनत्कुमारेण प्रोक्तं वेदविदांवराः।
द्वितीयं नारसिहाख्यं तृतीयं नान्दमेव च॥
चतुर्थं शिवधर्माख्यं दौर्वासं पञ्चमं विदुः।
षष्ठं तु नारदीयाख्यं कापिलं सप्तमं विदुः॥
अष्टमं मानवं प्रोक्तं ततश्चोशनसेरितम्।
ततो ब्रह्माण्डसंज्ञं तु वारुणाख्यं ततः परम्॥
ततः कालीपुराणाख्यं वासिष्ठं मुनिपुङ्गवाः।
ततो वासिष्ठं लैङ्गाख्यं प्रोक्तं माहेश्वरं परम्॥
ततः साम्बपुराणाख्यं ततः सौरं महाद्द्भुतम्।
पाराशरं ततः प्रोक्तं मारीचाख्यं ततः परम्॥
भार्गवाख्यं ततः प्रोक्तं सर्वधर्मार्थसाधकम्।
एवमुपपुराणान्यनेकप्रकाराणि द्रष्टव्यानि । न्याय आन्वीक्षिको पञ्चाध्यायी गौतमेन प्रणीता। प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्ता-वयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानाख्यानां षोडशपदार्थानामुद्देशलक्षणपरीक्षाभिस्तत्त्वज्ञानं तस्याः प्रयोजनम् । एवं दशाध्यायं वैशेषिकं शास्त्रं कणादेन प्रणीतम् । द्रव्यगुणकर्मसामान्य-विशेषसमवायानां षण्णां पदार्थानामभावसप्तमानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां व्युत्पादनं तस्य प्रयोजनम्। एतदपि न्यायपदेनोक्तम् ।
चतुर्णामुपाङ्गानामधुनोच्यते । तत्र सर्गप्रतिसर्गवंशमन्वन्तरवंशानु-चरितप्रतिपादकानि भगवता बादरायणेन कृतानि पुराणानि । तानि च ब्राह्मं पाद्मं वैष्णवं शैवं भागवतं नारदीयं मार्कण्डेयमाग्नेयं भविष्यं ब्रह्मवैवर्त्तं लैङ्गं वाराहं स्कान्दं वामनं कौर्मं मात्स्यं गारूढं ब्रह्माण्डं चेत्यष्टादश ।
आद्यं सनत्कुमारेण प्रोक्तं वेदविदांवराः।
द्वितीयं नारसिहाख्यं तृतीयं नान्दमेव च॥
चतुर्थं शिवधर्माख्यं दौर्वासं पञ्चमं विदुः।
षष्ठं तु नारदीयाख्यं कापिलं सप्तमं विदुः॥
अष्टमं मानवं प्रोक्तं ततश्चोशनसेरितम्।
ततो ब्रह्माण्डसंज्ञं तु वारुणाख्यं ततः परम्॥
ततः कालीपुराणाख्यं वासिष्ठं मुनिपुङ्गवाः।
ततो वासिष्ठं लैङ्गाख्यं प्रोक्तं माहेश्वरं परम्॥
ततः साम्बपुराणाख्यं ततः सौरं महाद्द्भुतम्।
पाराशरं ततः प्रोक्तं मारीचाख्यं ततः परम्॥
भार्गवाख्यं ततः प्रोक्तं सर्वधर्मार्थसाधकम्।
एवमुपपुराणान्यनेकप्रकाराणि द्रष्टव्यानि । न्याय आन्वीक्षिको पञ्चाध्यायी गौतमेन प्रणीता। प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्ता-वयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानाख्यानां षोडशपदार्थानामुद्देशलक्षणपरीक्षाभिस्तत्त्वज्ञानं तस्याः प्रयोजनम् । एवं दशाध्यायं वैशेषिकं शास्त्रं कणादेन प्रणीतम् । द्रव्यगुणकर्मसामान्य-विशेषसमवायानां षण्णां पदार्थानामभावसप्तमानां साधर्म्यवैधर्म्याभ्यां व्युत्पादनं तस्य प्रयोजनम्। एतदपि न्यायपदेनोक्तम् ।
Hindi Translation
बौधायन, आपस्तम्ब और कात्यायन आदि के द्वारा प्रणीत आध्वर्यव प्रयोगों के प्रतिपादक कल्पसूत्र हैं। लाट्यायन, ब्राह्मायण आदि के द्वारा प्रणीत कल्पसूत्र औद्गात्र प्रयोगों के प्रतिपादक हैं। इस प्रकार छः अङ्गों का प्रयोजन तथा भेद निरुपित हुआ ।
अब चारों उपाङ्गों का प्रयोजन कहते हैं। उनमें भगवान् बादरायण (व्यास) के विरचित सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का प्रतिपादक पुराण है। उन पुराणों की संख्या अट्ठारह है- ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, आग्नेय, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त, लैङ्ग, वाराह, स्कान्द, वामन, कौर्म, मात्स्य, गारुढ़ और ब्रह्माण्ड। इसी प्रकार उपपुराण भी अनेक प्रकार के हैं-यथा-सनत्कुमार के द्वारा विरचित आदिपुराण है। द्वितीय नारसिंह, तृतीय नान्द, चतुर्थ शिवधर्म, पञ्चम दौर्वास, षष्ठ नारदीय, सप्तम कापिल, अष्टम मानव, नवम औशनस, दशम ब्रह्माण्ड, एकादश वारुण नामक, उसके बाद काली पुराण और वासिष्ठ, वासिष्ठ लैंग और माहेश्वर, साम्ब और सौर, पराशर और मारीच एवं भार्गव पुराण है। ये उपपुराण सभी प्रकार के धर्म और अर्थ के साधक माने गये हैं।
न्याय दर्शन को ही आन्वीक्षिकी भी कहते हैं। यह दर्शन पाँच अध्यायों में विभक्त और गौतम प्रणीत है। प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह स्थान नाम के सोलह पदार्थों का उद्देश, लक्षण और परीक्षा के द्वारा तत्त्वज्ञान ही इसका प्रयोजन है।
कणाद ने दश अध्यायों में वैशेषिक शास्त्र का निर्माण किया। द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, इन छः तथा सातवाँ अभाव नाम के पदार्थों का परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य के प्रतिपादन द्वारा शक्तिग्रह ही इस दर्शन का प्रयोजन है। इसका भी न्याय शब्द से कथन किया गया है।
अब चारों उपाङ्गों का प्रयोजन कहते हैं। उनमें भगवान् बादरायण (व्यास) के विरचित सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित का प्रतिपादक पुराण है। उन पुराणों की संख्या अट्ठारह है- ब्राह्म, पाद्म, वैष्णव, शैव, भागवत, नारदीय, मार्कण्डेय, आग्नेय, भविष्य, ब्रह्मवैवर्त्त, लैङ्ग, वाराह, स्कान्द, वामन, कौर्म, मात्स्य, गारुढ़ और ब्रह्माण्ड। इसी प्रकार उपपुराण भी अनेक प्रकार के हैं-यथा-सनत्कुमार के द्वारा विरचित आदिपुराण है। द्वितीय नारसिंह, तृतीय नान्द, चतुर्थ शिवधर्म, पञ्चम दौर्वास, षष्ठ नारदीय, सप्तम कापिल, अष्टम मानव, नवम औशनस, दशम ब्रह्माण्ड, एकादश वारुण नामक, उसके बाद काली पुराण और वासिष्ठ, वासिष्ठ लैंग और माहेश्वर, साम्ब और सौर, पराशर और मारीच एवं भार्गव पुराण है। ये उपपुराण सभी प्रकार के धर्म और अर्थ के साधक माने गये हैं।
न्याय दर्शन को ही आन्वीक्षिकी भी कहते हैं। यह दर्शन पाँच अध्यायों में विभक्त और गौतम प्रणीत है। प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति, निग्रह स्थान नाम के सोलह पदार्थों का उद्देश, लक्षण और परीक्षा के द्वारा तत्त्वज्ञान ही इसका प्रयोजन है।
कणाद ने दश अध्यायों में वैशेषिक शास्त्र का निर्माण किया। द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य, विशेष, समवाय, इन छः तथा सातवाँ अभाव नाम के पदार्थों का परस्पर साधर्म्य और वैधर्म्य के प्रतिपादन द्वारा शक्तिग्रह ही इस दर्शन का प्रयोजन है। इसका भी न्याय शब्द से कथन किया गया है।
⬥ ग्रन्थ 10 ⬥
मूलम् | Original Text
एवं मीमांसा द्विविधा। कर्ममीमांसा शारीरकमीमांसा च । तत्र द्वादशाध्यायी कर्ममीमांसा "अथातो धर्मजिज्ञासा" इत्यादि "अन्वाहार्ये च दर्शनात्" (१६) इत्यन्ता भगवता जैमिनिना प्रणीता । घर्मप्रमाणम् । धर्मभेदाभेदौ । शेषशेषिभावः । क्रत्वर्थपुरुषार्थ......
भेदेन प्रयुक्तिविशेषः । श्रुत्यर्थपनादिभिः क्रमभेदः । अधिकारविशेषः । सामान्यातिदेशः । विशेषातिदेशः । ऊहः । बाधः । तन्त्रम् । प्रसङ्गश्चेति क्रमेण द्वादशाध्यायानामर्थाः। तथा सङ्कर्षणकाण्डमप्यध्यायचतुष्टयात्मकं जैमिनिप्रणीतम् । तच्च देवताकाण्डसंज्ञया प्रसिद्धमप्युपासनाख्यकर्म-प्रतिपादकत्वाकर्ममीमांसान्तर्गतमेव । तथा चतुरध्यायी शारीरकमीमांसा "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" इत्यादिरनावृत्तिः शब्दादित्यन्ता जीवब्रह्मैकत्व- साक्षात्कारहेतुः श्रवणाख्यविचारप्रतिपादकान्न्यायानुपदर्शयन्ती भगवता बादरायणेन कृता । तत्र सर्वेषामपि वेदान्तवाक्यानां साक्षात्परम्परया वा प्रत्यगभिन्नाद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यमिति समन्वयः प्रथमाध्यायेन प्रदर्शितः । तत्र च प्रथमपादे स्पष्टब्रह्मलिङ्गयुक्तानि वाक्यानि विचारितानि। द्वितीये त्वस्पष्टलिङ्गान्युपास्यब्रह्मविषयाणि । तृतीये वादेऽस्पष्टब्रह्म-लिङ्गानि प्रायशोज्ञेतब्रह्मविषयाणि । एवं पादत्रयेण वाक्यविचारः समापितः ।
भेदेन प्रयुक्तिविशेषः । श्रुत्यर्थपनादिभिः क्रमभेदः । अधिकारविशेषः । सामान्यातिदेशः । विशेषातिदेशः । ऊहः । बाधः । तन्त्रम् । प्रसङ्गश्चेति क्रमेण द्वादशाध्यायानामर्थाः। तथा सङ्कर्षणकाण्डमप्यध्यायचतुष्टयात्मकं जैमिनिप्रणीतम् । तच्च देवताकाण्डसंज्ञया प्रसिद्धमप्युपासनाख्यकर्म-प्रतिपादकत्वाकर्ममीमांसान्तर्गतमेव । तथा चतुरध्यायी शारीरकमीमांसा "अथातो ब्रह्म जिज्ञासा" इत्यादिरनावृत्तिः शब्दादित्यन्ता जीवब्रह्मैकत्व- साक्षात्कारहेतुः श्रवणाख्यविचारप्रतिपादकान्न्यायानुपदर्शयन्ती भगवता बादरायणेन कृता । तत्र सर्वेषामपि वेदान्तवाक्यानां साक्षात्परम्परया वा प्रत्यगभिन्नाद्वितीये ब्रह्मणि तात्पर्यमिति समन्वयः प्रथमाध्यायेन प्रदर्शितः । तत्र च प्रथमपादे स्पष्टब्रह्मलिङ्गयुक्तानि वाक्यानि विचारितानि। द्वितीये त्वस्पष्टलिङ्गान्युपास्यब्रह्मविषयाणि । तृतीये वादेऽस्पष्टब्रह्म-लिङ्गानि प्रायशोज्ञेतब्रह्मविषयाणि । एवं पादत्रयेण वाक्यविचारः समापितः ।
Hindi Translation
इसी प्रकार मीमांसा दर्शन भी दो प्रकार की है-कर्ममीमांसा और शारीरक मीमांसा। उनमें "अथातो धर्मजिज्ञासा" से प्रारम्भ करके "अन्वाहार्ये च दर्शनात्" इस सूत्र पर्यन्त भगवान् जैमिनि के बारह अध्यायों में कर्ममीमांसा का प्रणयन किया। उसमे धर्म में प्रमाण, धर्म-भेदाभेद, शेषशेषिभाव (अङ्गाङ्गीभाव), क्रत्वर्थ और पुरुषार्थ के भेद से प्रयुक्ति विशेष, श्रुति, अर्थ पाठ आदि के द्वारा क्रमभेद, अधिकार विशेष, सामान्यातिदेश, विशेषातिदेश, ऊह, बाध तन्त्र और प्रसङ्ग-क्रम से बाहर अध्यायों का प्रतिपाद्य पदार्थ हैं।
इसी प्रकार जैमिनि ने चार अध्यायों में विभक्त संकर्षण काण्ड का भी प्रणयन किया। यह देवताकाण्ड के नाम से प्रसिद्ध है तथापि उपासना नाम के कर्म का प्रतिपादक होने के कारण कर्ममीमांसा के अन्तर्गत ही है। चार अध्यायों में विभक्त शारीरक मीमांसा है। इसका प्रणेता भगवान् बादरायण हैं। यह 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' से लेकर 'अनावृत्तिः शब्दात्' इस सूत्र पर्यन्त विस्तृत है। श्रवण नामक विचार-प्रतिपादक न्यायों को प्रकाशित करती हुई जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादन ही इसका प्रयोजन है। सभी वेदान्त वाक्यों का साक्षात् या परम्परा सम्बन्ध से प्रत्यक् से अभिन्न अद्वितीय ब्रह्म में ही तात्पर्य है-यह प्रथम अध्याय में समन्वय किया गया है। प्रथम अध्याय के प्रथम पाद में स्पष्ट ब्रह्म-लिंग से युक्त वाक्यों का विचार किया गया है। द्वितीय पाद में अस्पष्ट लिंग से युक्त उपास्य ब्रह्म विषयक वाक्यों का विचार है। तृतीय पाद में अस्पष्ट ब्रह्मलिंग से युक्त प्रायः ज्ञेयब्रह्म विषयक वाक्यों का विचार है। इस प्रकार तीन पादों में वाक्यों का विचार समाप्त किया गया है।
इसी प्रकार जैमिनि ने चार अध्यायों में विभक्त संकर्षण काण्ड का भी प्रणयन किया। यह देवताकाण्ड के नाम से प्रसिद्ध है तथापि उपासना नाम के कर्म का प्रतिपादक होने के कारण कर्ममीमांसा के अन्तर्गत ही है। चार अध्यायों में विभक्त शारीरक मीमांसा है। इसका प्रणेता भगवान् बादरायण हैं। यह 'अथातो ब्रह्मजिज्ञासा' से लेकर 'अनावृत्तिः शब्दात्' इस सूत्र पर्यन्त विस्तृत है। श्रवण नामक विचार-प्रतिपादक न्यायों को प्रकाशित करती हुई जीव और ब्रह्म की एकता प्रतिपादन ही इसका प्रयोजन है। सभी वेदान्त वाक्यों का साक्षात् या परम्परा सम्बन्ध से प्रत्यक् से अभिन्न अद्वितीय ब्रह्म में ही तात्पर्य है-यह प्रथम अध्याय में समन्वय किया गया है। प्रथम अध्याय के प्रथम पाद में स्पष्ट ब्रह्म-लिंग से युक्त वाक्यों का विचार किया गया है। द्वितीय पाद में अस्पष्ट लिंग से युक्त उपास्य ब्रह्म विषयक वाक्यों का विचार है। तृतीय पाद में अस्पष्ट ब्रह्मलिंग से युक्त प्रायः ज्ञेयब्रह्म विषयक वाक्यों का विचार है। इस प्रकार तीन पादों में वाक्यों का विचार समाप्त किया गया है।
⬥ ग्रन्थ 11 ⬥
मूलम् | Original Text
चतुर्थपादे तु प्रधानविषयत्वेन संदिह्यमानान्यव्यक्त्ताजादिपदानि चिन्तितानि । एवं वेदान्तानामद्वये ब्रह्मणि समन्वये सिद्धे तत्र संभावित स्मृतितर्कादिप्रयुक्तैस्तर्कैविरोधमाशङ्क्य तत्परिहारः क्रियत इत्यविरोधो द्वितीयाध्यायेन दर्शितः । तत्राऽऽद्य पादे सांख्ययोगकाणादादिस्मृतिभिः सांख्यादिप्रयुक्तैस्तर्कैश्च विरोधो वेदान्तसमन्वयस्य परिहृतः । द्वितीये पादे सांख्यादिमतानां दुष्टत्वं प्रतिपादितम्। स्वपक्षस्थापनपरवक्ष-निवारणरुपपर्वद्वयात्मकत्वात् विचारस्य । तृतीये पादे महाभूतसृष्ट्यादि-श्रुतीनां परस्परविरोधः पूर्वभागेण परिहृतः ।
उत्तरभागेण तु जीवविषयाणाम् । चतुर्थपादे त्विन्द्रियर्याविषयश्रुतीनां विरोधः परिहृतः । तृतीयेऽध्याये साधननिरुपणम्। तत्र प्रथमे पादे जीवस्य परलोकगमनागमननिरुपणेन वैराग्यं निरुपितम्। द्वितीये पादे पूर्वभागेण त्वंपदार्थः शोधितः। उत्तरभागेण तत्पदार्थः । तृतीये पादे निर्गुणे ब्रह्मणि नानाशाकखापठितपुनरुक्तपदोपसंहारः कृतः । प्रसङ्गाच्च सगुणनिर्गुणविद्यासु शाखान्तीय गुणोपसंहारानुपसंहारौ निरुपितौ। चतुर्थे पादे निर्गुणब्रह्मविद्याया बहिरङ्गसाधनान्याश्रमयज्ञादीन्यन्तरङ्ग-साधनानि शमदमनिदिध्यासनादीनि निरुपितानि । चतुर्थेऽध्याये सगुण-निर्गुणविद्ययोः फलविशेषनिर्णयः कृतः। तत्र प्रथमे पादे श्रवणाद्यावृत्त्या निर्गुणं ब्रहा साक्षात्कृत्य जीवतः पापपुण्यालेपलक्षणा जीवन्मुक्तिरभिहिता। द्वितीये पादे म्रियमाणस्योत्कान्तिप्रकारश्चिन्तितः। तृतीये पादे सगुण ब्रह्मविदो मृतस्योत्तरमार्गोऽभिहितः। चतुर्थे पादे पूर्वभागेण निगुणब्रह्म-विदो विदेहकैवल्यप्राप्तिरुक्ता। उत्तरभागेण सगुणब्रह्मविदो ब्रह्मलोक स्थितिरुक्तेति । इदमेव सर्वशास्त्राणां मूर्धन्यम्। शास्त्राम्तरं सर्वमस्यैव शेषभूतमितीदमेव मुमुक्षुभिरादरणीयं श्रीशंकरभगवत्पादोदितप्रकारेणेति रहस्यम् ।
उत्तरभागेण तु जीवविषयाणाम् । चतुर्थपादे त्विन्द्रियर्याविषयश्रुतीनां विरोधः परिहृतः । तृतीयेऽध्याये साधननिरुपणम्। तत्र प्रथमे पादे जीवस्य परलोकगमनागमननिरुपणेन वैराग्यं निरुपितम्। द्वितीये पादे पूर्वभागेण त्वंपदार्थः शोधितः। उत्तरभागेण तत्पदार्थः । तृतीये पादे निर्गुणे ब्रह्मणि नानाशाकखापठितपुनरुक्तपदोपसंहारः कृतः । प्रसङ्गाच्च सगुणनिर्गुणविद्यासु शाखान्तीय गुणोपसंहारानुपसंहारौ निरुपितौ। चतुर्थे पादे निर्गुणब्रह्मविद्याया बहिरङ्गसाधनान्याश्रमयज्ञादीन्यन्तरङ्ग-साधनानि शमदमनिदिध्यासनादीनि निरुपितानि । चतुर्थेऽध्याये सगुण-निर्गुणविद्ययोः फलविशेषनिर्णयः कृतः। तत्र प्रथमे पादे श्रवणाद्यावृत्त्या निर्गुणं ब्रहा साक्षात्कृत्य जीवतः पापपुण्यालेपलक्षणा जीवन्मुक्तिरभिहिता। द्वितीये पादे म्रियमाणस्योत्कान्तिप्रकारश्चिन्तितः। तृतीये पादे सगुण ब्रह्मविदो मृतस्योत्तरमार्गोऽभिहितः। चतुर्थे पादे पूर्वभागेण निगुणब्रह्म-विदो विदेहकैवल्यप्राप्तिरुक्ता। उत्तरभागेण सगुणब्रह्मविदो ब्रह्मलोक स्थितिरुक्तेति । इदमेव सर्वशास्त्राणां मूर्धन्यम्। शास्त्राम्तरं सर्वमस्यैव शेषभूतमितीदमेव मुमुक्षुभिरादरणीयं श्रीशंकरभगवत्पादोदितप्रकारेणेति रहस्यम् ।
Hindi Translation
चतुर्थ पाद में प्रधान विषय रूप से संदेहास्पद अव्यक्त, अज आदि पदों का विचार है। इस प्रकार वेदान्त वाक्योंं का अद्वितीय ब्रह्म में समन्वय करके द्वितीय अध्याय में उस ब्रह्म में संभावित स्मृति और तर्क आदि से प्रयुक्त तर्कों के साथ विरोध की आशंका और उसका परिहार किया गया है। अतः अविरोध प्रतिपादन ही मुख्य है। उसके प्रथम पाद में वेदान्तसमन्वय का सांख्य, योग, काणाद आदि स्मृतियों और उनके द्वारा प्रयुक्त तर्कों के साथ विरोध का परिहार किया गया है। द्वितीय पाद में सांख्य आदि स्मृतियों के मतों को दोषयुक्त बतलाया गया है। कारण यह है विचार के दो पक्ष होते हैं- स्वपक्ष की स्थापना और परपक्ष का निराकरण। तृतीय पाद के पूर्वभाग में महाभूत की दृष्टि आदि के प्रतिपादन करनेवाली श्रुतियों के परस्पर विरोध क परिहार है। उसके उत्तर भाग में जीव-विषयक विचार है। चतुर्थ पाद में इन्द्रिय विषयक श्रुतियों के परस्पर विरोधों का परिहार है। तृतीय अध्याय में साधन का निरुपण है। उसके प्रथम पाद में जीव के परलोक में गमन तथा वहाँ से पुनः आगमन के नीराकरण के द्वारा वैराग्य का निरुपण है। द्वितीय पाद के पूर्वभाग में त्वं पदार्थ और उत्तर भाग में तत् पदार्थ का शोधन किया है। तृतीय पाद में निर्गुण ब्रह्म में ही अनेक शाखाओं में पठित पुनरुक्त पदों का उपासंहार किया गया है और प्रसंगत सगुण और निर्गुण विद्याओं में शालान्तरीय गुणों का उपसंहार तथा अनुपसंहार निरुपित है। चतुर्थ पाद में निर्गुण ब्रह्मविद्या के बहिरंग साधनों और आश्रम, यज्ञ आदि अन्तरंग साधनों तथा शम, दम, निदिध्यासन आदि का निरुपण है।
चतुर्थ अध्याय में सगुण और निर्गुण विद्याओं के फल विशेषका निर्णय किय गया है। उसके प्रथम पाद में श्रवण आदि की आवृत्ति से निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करके जीते हुए ही पाप एवं पुण्य के अलेप-लक्षण जीवन्मुक्ति का प्रतिपादन है। अलेप का सम्बन्धाभाव अर्थात् उससे होने वाले स्वर्ग आदि का अभाव अर्थ है। द्वितीय पाद में मरने वाले पुरुषों की उत्क्रान्ति के प्रकार का विचार है। तृतीय पाद में सगुण ब्रह्म को जानने वाले पुरुष को मर जाने पर उत्तरमार्ग की प्राप्ति का प्रतिपादन है। चतुर्थपाद के पूर्वभाग में निर्गुण को जानने वालों के विदेह कैवल्य की प्राप्ति का वर्णन है। उत्तरभाग में सगुण ब्रह्मज्ञानी का बह्मलोक में स्थिति का वर्णन है। यही सभी शास्त्रों में प्रधान है। इससे भिन्न सभी शास्त्र इसी के अङ्ग-भूत हैं। अतः मुमुक्षुओं के द्वारा श्रीशंकर भगवत्वाद की रीति के अनुसार यही आदरणीय है। यही रहस्यम्भूत सिद्धान्त है।
चतुर्थ अध्याय में सगुण और निर्गुण विद्याओं के फल विशेषका निर्णय किय गया है। उसके प्रथम पाद में श्रवण आदि की आवृत्ति से निर्गुण ब्रह्म का साक्षात्कार करके जीते हुए ही पाप एवं पुण्य के अलेप-लक्षण जीवन्मुक्ति का प्रतिपादन है। अलेप का सम्बन्धाभाव अर्थात् उससे होने वाले स्वर्ग आदि का अभाव अर्थ है। द्वितीय पाद में मरने वाले पुरुषों की उत्क्रान्ति के प्रकार का विचार है। तृतीय पाद में सगुण ब्रह्म को जानने वाले पुरुष को मर जाने पर उत्तरमार्ग की प्राप्ति का प्रतिपादन है। चतुर्थपाद के पूर्वभाग में निर्गुण को जानने वालों के विदेह कैवल्य की प्राप्ति का वर्णन है। उत्तरभाग में सगुण ब्रह्मज्ञानी का बह्मलोक में स्थिति का वर्णन है। यही सभी शास्त्रों में प्रधान है। इससे भिन्न सभी शास्त्र इसी के अङ्ग-भूत हैं। अतः मुमुक्षुओं के द्वारा श्रीशंकर भगवत्वाद की रीति के अनुसार यही आदरणीय है। यही रहस्यम्भूत सिद्धान्त है।
⬥ ग्रन्थ 12 ⬥
मूलम् | Original Text
एवं धर्मशास्राणि मनुयाज्ञवल्क्यविष्णुयमाङ्गिरोवसिष्ठदक्षसंवर्त्त-शातातपपराशरगौतमशङ्खलिखितहारीतापस्तम्बोशनोव्यासकात्यायनबृह-स्पतिदेवलनारदपैठीनसिप्रभृतिभिः कृतानि वर्णाश्रमधर्मविशेषाणां विभागेन प्रतिपादकानि । एवं व्यासकृतं महाभारतं वाल्मीकिकृतं रामायणं च धर्मशास्त्र एवान्तर्भूत स्वयमितिहासत्वेन प्रसिद्धम् । सांख्यादीनां धर्म-शास्त्रान्तर्भावेऽपीह स्वशब्देनैव निर्देशात्पृथगेव संगतिर्वाच्या ।
अथ वेदचतुष्टयस्य क्रमेण चत्वार उपवेदाः। तत्रायुर्वेदस्याष्टौ स्थानानि भवन्ति । सूत्रं शारीरमैन्द्रियं चिकित्सा विमानं विकल्पः सिद्धिश्चेति ।
अथ वेदचतुष्टयस्य क्रमेण चत्वार उपवेदाः। तत्रायुर्वेदस्याष्टौ स्थानानि भवन्ति । सूत्रं शारीरमैन्द्रियं चिकित्सा विमानं विकल्पः सिद्धिश्चेति ।
Hindi Translation
धर्मशास्त्र के प्रणेता अनेक आचार्य हैं। यथा- मनु, याज्ञवल्क्य, विष्णु, यम, अङ्गिरा, वसिष्ठ, दक्ष, संवर्त्त, शातातप, पराशर, गौतम, शङ्ख, लिखित, हारीत, आपस्तम्ब, उसना, व्यास, कात्यायन, बृहस्पति, देवल, नारद, पैठीनसि इत्यादि। इन सबों ने धर्मशास्त्रों की रचना की है। वे धर्मशास्त्र वर्णधर्म तथा आश्रमधर्म को विभक्त करके प्रतिपादन करते हैं। इसी प्रकार व्यास द्वारा विरचित महाभारत तथा वाल्मीकि-कृत रामायण धर्मशास्त्र के ही अन्तर्गत है और स्वयं इतिहास रूप से प्रसिद्ध है। सांख्य आदि का धर्मशास्त्र में अन्तर्भाव होने पर भी अपने विशेष शब्दों के द्वारा ही निर्दिष्ट होने के कारण उसकी संगति पृथक् ही कहनी चाहिए।
चारों वेदों के क्रमशः चार उपवेद भी हैं। उनमें आयुर्वेद के आठ स्थान होते हैं-सूत्र, शारीर, ऐन्द्रिय, चिकित्सा, निदान, विमान, विकल्प और सिद्धि।
चारों वेदों के क्रमशः चार उपवेद भी हैं। उनमें आयुर्वेद के आठ स्थान होते हैं-सूत्र, शारीर, ऐन्द्रिय, चिकित्सा, निदान, विमान, विकल्प और सिद्धि।
⬥ ग्रन्थ 13 ⬥
मूलम् | Original Text
ब्रह्मप्रजापत्यश्विधन्वन्तरीन्द्रभरद्वाजात्रेयाग्निवेश्यादिभिरुपदिष्टश्चरकेण संक्षिप्तः । तत्रैव सुश्रुतेन पञ्चस्थानात्मकं प्रस्थानान्तरं कृतम् । एवं वाग्भट्टादिनाऽपि बहुधेति न शाखभेदः । कामशास्त्रमप्यायुर्वेदान्तर्गतमेव । तत्रैव सुश्रुतेन वाजीकरणाख्यकामशास्त्राभिधानात् । तत्र वात्स्यायनेन पञ्चाध्यायात्मकं कामशास्त्रं प्रणीतम् । तस्य च विषयवैराग्यमेव प्रयोजनम् । शास्त्रोद्दीपितमार्गेणापि विषयभोगे दुःखमात्रपर्यवसानात्। चिकित्साशास्रस्य रोगतत्साधनरोगनिवृत्तितत्साधनज्ञानं प्रयोजनम् ।
Hindi Translation
यह ब्रह्मा, प्रजापति,' अश्विन्, धन्वन्तरि, इन्द्र, भरद्वाज, आत्रेय और अग्नि-वेश्य के द्वारा उद्दिष्ट बौर चरक के द्वारा संक्षिप्त है अर्थात् उन लोगों ने इस उपवेद का विस्तृत रुप से विवेचन किया और चरक ने उनका सारभूत तत्त्व संक्षेप रुप से अपनी संहिता में प्रतिपादन किया। उसी में सुश्रुत ने पञ्च स्थानात्मक प्रस्थानान्तर का प्रणयन किया। इसी प्रकार वाग्मट्ट आदि आचार्यों ने भी अनेक प्रकार से इसका प्रतिपादन किया गया है तथापि शास्त्रभेद नहीं है, एक ही शास्त्र है। कामशास्र भी आयुर्वेद के अन्तर्गत ही है। उसी में सुश्रुत ने वाजी-करण नाम के कामशास्त्र का कथन किया है। वात्स्यायन ने पांच अध्यायों में विभक्त कामशास्त्र का प्रणयन किया है। उसका सांसारिक विषय-वासनाओं से वैराग्य ही प्रयोजन है, शास्त्र से उद्दीपित मार्ग के द्वारा विषय के भोग में दुःख मात्र ही होता है अर्थात् उस भोग की परिसमाप्ति दुःख में ही होती है। चिकित्सा शास्त्र का रोग, रोग के साधन, रोग की निवृत्ति और रोगनिवृत्ति के साधन का ज्ञान ही प्रयोजन है !
⬥ ग्रन्थ 14 ⬥
मूलम् | Original Text
एवं धनुर्वेदः पादचतुष्टयात्मको विश्वामित्रप्रणीतः । तत्र प्रथमो दीक्षापादः । द्वितीयः संग्रहपादः । तृतीयः सिद्धिपादः। चतुर्थः प्रयोगपादः। तत्र प्रथमे पादे धनुर्लक्षणमधिकारिनिरूपणं च कृतम्। अत्र धनुःशब्दश्चापे रुढोऽपि धनुर्विधायुधे प्रवर्त्तते। तच्चतुर्विधम्- मुक्तममुक्तं मुक्तामुक्तं यन्त्र मुक्तम्। मुक्तं चक्रादि। अमुक्तं खड्गादि । मक्तामुक्तं शल्यावान्तर भेदादि। यन्त्रमुक्तं शरादि । तत्र । तत्र मुक्तमस्त्रमुच्यते। अमुक्तं शस्त्रमित्युच्यते। तदपि ब्राह्मवैष्णवपाशुपतप्राजापत्याग्नेयादि भेदादनेकविधम् । एवं साधिदैवतेषु समन्त्रकेषु चतुर्विधायुधेषु येषामधिकारः क्षत्रियकुमाराणां तदनुयायिनां च ते सर्वे चतुर्विधाः पदातिरथगजतुरगारुढाः। दीक्षाभिषेकशकुनमङ्गल-करणादिकं च सर्वमपि प्रथमे पादे निरुपितम् । सर्वेषां शस्त्रविशेषाणामा-चार्यस्य व लक्षणपूर्वकं संग्रहणमधिकारो दर्शितो द्वितीयपादे। गुरुसम्प्रदाय-सिद्धानां शस्त्रविशेषाणां पुनः पुनरभ्यासो मन्त्रदेवतासिद्धिकरणमपि निरुपितं तृतीयपादे ।
Hindi Translation
धनुर्वेद चार पादों से युक्त और विश्वामित्र-प्रणीत है। उसका पहला दीक्षापाद, दूसरा संग्रहपाद, तीसरा सिद्धिपाद और चौथा प्रयोगपाद है। प्रथम पाद में धनुष का लक्षण और अधिकारी का निरुपण है। यहाँ धनुष शब्द चाप अर्थ में रुढ़ है तथापि चतुर्विध आयुध का वाचक है। वे बार प्रकार के हैं-मुक्त, अमुक्त, मुक्तामुक्त और यन्त्रमुक्त। चक्र आदि मुक्त, तलवार आदि अमुक्त, शल्य या शक्ति और उसके अवान्तर भेद मुक्तामुक्त तथा वाण आदि यन्त्रमुक्त कहलाते हैं। मुक्त को अस्त्र और अमुक्त शस्त्र कहते हैं। वे भी ब्राह्म, वैष्णव, पाशुपत, प्राजापत्य, आग्नेय आदि के भेद से अनेक प्रकार के हैं। इस प्रकार अधिदेवता और मन्त्रों के सहित चार प्रकार के आयुधों में जिन क्षत्रिय कुमारों का अधिकार है, उनके अनुयायी भी वे चार प्रकार के होते हैं-पदाति, रथारुड़, गजारूढ़ और तुरगारुढ़ । तुरग अश्व का वाचक है। प्रथम प्राद में दीक्षा, अभिषेक, शकुन तथा मङ्गलकरणादि निरुपित हैं। द्वितीय पाद में सभी शस्त्र-विशेषों के आचार्यों का लक्षण पूर्वक संग्रह करने की तरीका प्रदक्षित है। तृतीय पाद में गुरु सम्प्रदाय से सिद्ध शस्त्र विशेषों का पुनः पुनः अभ्यास और मन्त्र, देवता आदि का सिद्धिकरण भी निरूपित है।
⬥ ग्रन्थ 15 ⬥
मूलम् | Original Text
एवं देवतार्चनाभ्यासादिभिः सिद्धानामस्त्रविशेषाणां प्रयोगश्चतुर्थपादे निरुपितः । क्षत्रियाणां स्वधर्माचरणं युद्धम् । दुष्टस्य दण्डश्चोरादिभ्यः प्रजापालनं च धनुर्वेदस्य प्रयोजनम्। एवं च ब्रह्मप्रजापत्यादिक्रमेण विश्वामित्रप्रणीतं धनुर्वेदशास्त्रम्।
एवं गान्धर्ववेदो भगवता भरतेन प्रणीतः। स गीतवाद्यनृत्यभेदेन बहुविधः । देवताराधनं निविकल्पकसमाध्यादिसिद्धिश्च गान्धर्ववेदस्य प्रयोजनम्।
एवमर्थशास्त्रमपि बहुविधम् । नीतिशास्त्रमश्वशास्त्रं शिल्पशास्त्रं सूपशास्त्रं चतुःषष्ठिकलाशास्त्रं चेति । तत्सर्वं नानामुनिभिः प्रणीतम् । अस्य च सर्वस्य लौकिकवत्प्रयोजनभेदो द्रष्टव्यः।
एवमष्टादश विद्यास्त्रयीशब्देनोक्ताः । अन्यथा न्यूनताप्रसङ्गात् ।
एवं गान्धर्ववेदो भगवता भरतेन प्रणीतः। स गीतवाद्यनृत्यभेदेन बहुविधः । देवताराधनं निविकल्पकसमाध्यादिसिद्धिश्च गान्धर्ववेदस्य प्रयोजनम्।
एवमर्थशास्त्रमपि बहुविधम् । नीतिशास्त्रमश्वशास्त्रं शिल्पशास्त्रं सूपशास्त्रं चतुःषष्ठिकलाशास्त्रं चेति । तत्सर्वं नानामुनिभिः प्रणीतम् । अस्य च सर्वस्य लौकिकवत्प्रयोजनभेदो द्रष्टव्यः।
एवमष्टादश विद्यास्त्रयीशब्देनोक्ताः । अन्यथा न्यूनताप्रसङ्गात् ।
Hindi Translation
इस प्रकार देवता का सेवन और बार-बार अभ्यास से सिद्ध अस्त्रविशेषों का प्रयोग चतुर्थ पाद में निरुपित है। क्षत्रियों का स्वधर्म आचरण युद्ध है। दुष्टों को दण्ड देना और चोर आदि से प्रजाओं का परिपालन=परिरक्षण करना ही धनुर्वेद का प्रयोजन है। इस प्रकार ब्रह्मा तथा प्रजापति आदि के क्रम से विश्वामित्र के द्वारा प्रणीत धनुर्वेद शास्त्र है।
गान्धर्व वेद का भगवान् भरत ने प्रणयन किया। वह गीत, वाद्य और नृत्य आदि के भेद से अनेक प्रकार का है। देवताओं की आराधना और निर्विकल्प समाधि आदि की सिद्धि गान्धर्व वेद का प्रयोजन है।
अर्थशास्त्र मी अनेक प्रकार के हैं। यथा-नीतिशास्त्र, अश्वशास्त्र, शिल्प-शास्त्र, सूपशास्त्र और चतुःषष्ठिकलाशास्त्र। ये सब अनेक मुनियों के द्वारा विरचित हैं। इन सबों का लौकिक प्रयोजनों के भेद के समान प्रयोजन भेद समझना चाहिए। इन अट्ठारह विद्यानों को त्रयी शब्द से कहा गया है, अन्यथा न्यूनता हो जायेगी ।
गान्धर्व वेद का भगवान् भरत ने प्रणयन किया। वह गीत, वाद्य और नृत्य आदि के भेद से अनेक प्रकार का है। देवताओं की आराधना और निर्विकल्प समाधि आदि की सिद्धि गान्धर्व वेद का प्रयोजन है।
अर्थशास्त्र मी अनेक प्रकार के हैं। यथा-नीतिशास्त्र, अश्वशास्त्र, शिल्प-शास्त्र, सूपशास्त्र और चतुःषष्ठिकलाशास्त्र। ये सब अनेक मुनियों के द्वारा विरचित हैं। इन सबों का लौकिक प्रयोजनों के भेद के समान प्रयोजन भेद समझना चाहिए। इन अट्ठारह विद्यानों को त्रयी शब्द से कहा गया है, अन्यथा न्यूनता हो जायेगी ।
⬥ ग्रन्थ 16 ⬥
मूलम् | Original Text
तथा सांख्यशास्त्रं भगवता कपिलेन प्रणीतम् । तच्च "अथ त्रिविध-दुःखात्यन्तनिवृत्तिरत्यन्तपुरुषार्थः" इत्यादि षडध्यायम् । तत्र प्रथमेऽध्याये विषयाः निरुपिताः। द्वितीयेऽध्याये प्रधानकार्याणि । तृतीयेऽऽयाये विषयेभ्यो वैराग्यम् । चतुर्थेऽध्याये विरक्तानां पिङ्गलाकुरवादी नामाख्यायिकाः । पञ्चमेऽध्याये परपक्षनिर्णयः । षष्ठेऽध्याये सर्वार्थसंक्षेपः। प्रकृतिपुरुषविवेकज्ञानं सांख्यशास्त्रस्य प्रयोजनम् । तथा योगशास्त्रं भगवता पतञ्जलिना प्रणीतम् । अथ योगानुशासनमित्यादि पादचतुष्ट-यात्मकम् । तत्र प्रथमे पादे चित्तवृत्तिनिरोधात्मकः समाधिरभ्यास-वैराग्यरुपं च तत्साधनं निरुपितम्।
द्वितीये पादे विक्षिप्तचित्तस्यापि समाधिसिद्धर्थं यमनियमासन-प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधय इत्यष्टाङ्गानि निरुपितानि । तृतीये पादे योगिविभूतयः। चतुर्थे पादे कैवल्यमिति । तस्य च विजातोय प्रत्ययनिरोषद्वारेण निदिध्यासनसिद्धिः प्रयोजनम्। तथा पशुपतिमतं पाशुपतं शास्त्रं पशुपतिना पशुपाशविमोक्षणाय "अथातः पाशुपतं योगविधि व्याख्यास्यामः" इत्यादि पञ्चाध्यायं विरचितम्। तत्राध्याय-पञ्चकेनापि कार्यरुपो जीवः। पशुः कारणं पतिरीश्वरः। योगः पशुपती चित्तसमाधानम्। विधिर्भस्मना त्रिषवणस्नानादिश्च निरुपितः । दुःखान्तसंज्ञो मोक्षश्च प्रयोजनम् । एत एव कार्यकारणयोगविधिदुःखान्ता इत्याख्यायन्ते ।
द्वितीये पादे विक्षिप्तचित्तस्यापि समाधिसिद्धर्थं यमनियमासन-प्राणायामप्रत्याहारधारणाध्यानसमाधय इत्यष्टाङ्गानि निरुपितानि । तृतीये पादे योगिविभूतयः। चतुर्थे पादे कैवल्यमिति । तस्य च विजातोय प्रत्ययनिरोषद्वारेण निदिध्यासनसिद्धिः प्रयोजनम्। तथा पशुपतिमतं पाशुपतं शास्त्रं पशुपतिना पशुपाशविमोक्षणाय "अथातः पाशुपतं योगविधि व्याख्यास्यामः" इत्यादि पञ्चाध्यायं विरचितम्। तत्राध्याय-पञ्चकेनापि कार्यरुपो जीवः। पशुः कारणं पतिरीश्वरः। योगः पशुपती चित्तसमाधानम्। विधिर्भस्मना त्रिषवणस्नानादिश्च निरुपितः । दुःखान्तसंज्ञो मोक्षश्च प्रयोजनम् । एत एव कार्यकारणयोगविधिदुःखान्ता इत्याख्यायन्ते ।
Hindi Translation
सांख्यशास्त्र भगवान् कपिल द्वारा प्रणीत है। वह 'अथ त्रिविधदुःखात्यन्त निवृत्तिरत्यन्त पुरुषार्थ' (तीन प्रकार के दुखों की अत्यन्त निवृत्ति ही अत्यन्त पुरुषार्थ हैं) से प्रारम्भ करके छः अध्यायों में कहा गया है (उसके प्रथम अध्याय में विषयों का, द्वितीय अध्याय में प्रधान के कार्यों का और तृतीय अध्याय में विषयों से वैराग्य का निरुपण है। चतुर्थ अध्याय में पिंगल, कुरवआदि विरक्तों की आख्यायिकाएँ, पञ्चम अध्याय में परपक्ष का निर्णय और षष्ठ अध्याय में सभी पदार्थों का संक्षेप रूप से वर्णन है। प्रकृति और पुरुष के विवेकज्ञान=भेदज्ञान ही सांख्यशास्त्र का प्रयोजन है। इसी को अन्यताख्याति भी कहते हैं।
योगशास्र पतञ्जलि के द्वारा प्रणीत है। 'अथ योगानुशासनम्' से प्रारम्भ करके चार पादों में वर्णित है। उसके प्रथम पाद में चित्तवृत्ति निरोधात्मक समाधि, अभ्यास और वैराग्य का स्वरूप और उसके साधन का निरुपण है। द्वितीय पाद में विक्षिप्त चित्त वाले पुरुषों को भी समाधि की सिद्धि के लिये यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन आठ अंगों का निरुपण है। तृतीय पाद में योग से प्राप्त विभूतियों का वर्णन है। चतुर्थ पाद में कैवल्य प्रतिपादित है। इस योगशास्त्र का विजातीय प्रत्ययों=ज्ञानों के निरोध के द्वारा निदिध्यासन की सिद्धि ही प्रयोजन है।
जिसमें पशुपति का मत वर्णित है, वह पाशुपतशास्त्र है। पशुपति ने पशु को पाश से विमुक्ति के लिये 'अथातः पाशुपतं योगविधिं व्याख्यास्यामः' से लेकर पाँच अध्यायों में निरुपण किया है। उन पाँचों अध्यायों में कार्यरूप जीव, पशुकारण, पति ईश्वर, पशुपति में चित्त की समाधि योग और भस्म से त्रिषवण स्नान आदि विधियों का वर्णन है। दुःखान्त-संज्ञक मोक्ष ही प्रयोजन है। इसी को कार्य, कारण, योग विधि और दुःखान्त शब्दों से कहा जाता है।
योगशास्र पतञ्जलि के द्वारा प्रणीत है। 'अथ योगानुशासनम्' से प्रारम्भ करके चार पादों में वर्णित है। उसके प्रथम पाद में चित्तवृत्ति निरोधात्मक समाधि, अभ्यास और वैराग्य का स्वरूप और उसके साधन का निरुपण है। द्वितीय पाद में विक्षिप्त चित्त वाले पुरुषों को भी समाधि की सिद्धि के लिये यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि इन आठ अंगों का निरुपण है। तृतीय पाद में योग से प्राप्त विभूतियों का वर्णन है। चतुर्थ पाद में कैवल्य प्रतिपादित है। इस योगशास्त्र का विजातीय प्रत्ययों=ज्ञानों के निरोध के द्वारा निदिध्यासन की सिद्धि ही प्रयोजन है।
जिसमें पशुपति का मत वर्णित है, वह पाशुपतशास्त्र है। पशुपति ने पशु को पाश से विमुक्ति के लिये 'अथातः पाशुपतं योगविधिं व्याख्यास्यामः' से लेकर पाँच अध्यायों में निरुपण किया है। उन पाँचों अध्यायों में कार्यरूप जीव, पशुकारण, पति ईश्वर, पशुपति में चित्त की समाधि योग और भस्म से त्रिषवण स्नान आदि विधियों का वर्णन है। दुःखान्त-संज्ञक मोक्ष ही प्रयोजन है। इसी को कार्य, कारण, योग विधि और दुःखान्त शब्दों से कहा जाता है।
⬥ ग्रन्थ 17 ⬥
मूलम् | Original Text
एवं वैष्णवं नारदादिभिः कृतं पाञ्चरात्रम् । तत्र वासुदेवसंकर्षण-प्रद्युम्नानिरुद्धाश्चत्वारः पदार्था निरुपिताः। भगवान्वासुदेवः सर्वकारणं परमेश्वरः । तस्मादुपपद्यते संकर्षणाख्यो जीवः । तस्मान्मनः प्रद्युम्नः । तस्मादनिरुद्धोऽहंकारः । सर्वे चैते भगवतो वासुदेवस्यैवांशभूताः । तदभिन्ना एवेति भगवतो वासुदेवस्य मनोवाक्कायवृत्तिभिराराधनं कृत्वा कृतकृत्यो भवतीत्यादि च निरुपितम् ।
Hindi Translation
नारद आदि के द्वारा प्रणीत पाञ्चरात्र वैष्णवों का शास्त्र है। यही वैष्णवशास्त्र कहलाता है। उसमें वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध नाम के चार पदार्थ निरुपित है। भगवान् वासुदेव सबों के कारण परमेश्वर हैं। उनसे संकर्षण नाम के जीव उत्पन्न होता है। उससे प्रद्युम्न नामक मन और उससे अनिरुद्ध नामक अहंकार की उत्पत्ति होती है। ये सभी भगवान् वासुदेव के ही अंशभूत हैं। उन सबों से अभिन्न भगवान् वासुदेव ही का मन, वाणी, शरीर और मन की वृत्तियों से आराधना करके आराधक कृतकृत्य हो जाता है-इत्यादि सभी पदार्थों का निरुपण है।
⬥ ग्रन्थ 18 ⬥
मूलम् | Original Text
तदेवं दर्शितः प्रस्थानभेदः । सर्वेषां च संक्षेपेण त्रिविध एव प्रस्थानभेदः । तत्राऽऽरम्भवाद एकः । परिणामवादो द्वितीयः । विवर्त्त-वादस्तृतीयः । पार्थिवाप्यतैजस वायवीयाश्चतुविधाः परमाणवो द्वयणुकादिक्रमेण ब्रह्माण्डपर्यन्तं जगदारभन्ते । असदेव कार्य कारक व्यापारादुपपद्यत इति प्रथमस्तार्किकाणाम्, मीमांसकानां च सत्त्वरजस्तमो गुणात्मकं प्रधानमेव महदहंकारादिक्रमेण जगदाकारेण परिणमते।
पूर्वमपि सूक्ष्मरुपेण सदेव कार्यं कारणव्यापारेणाभिव्यज्यत इति
पूर्वमपि सूक्ष्मरुपेण सदेव कार्यं कारणव्यापारेणाभिव्यज्यत इति
Hindi Translation
इस प्रकार प्रस्थान प्रदर्शित किया गया। संक्षेप रूप से सबों का तीन ही प्रस्थान भेद है-१ आरम्भवाद, २. परिणामवाद, ३. विवर्त्तवाद। पार्थिव, आप्य, तेजैस और वायवीय चार प्रकार के परमाणु द्वयणुकादि क्रम से ब्रह्माण्ड पर्यन्त जगत् का आरम्भ करते हैं। असत् ही कार्य कारक के व्यापार से उत्सन्न होता है-यह तार्किकों का मत है। मीमांसकों के मत में सत्त्व, रजस् और तमोगुणात्मक प्रधान ही महत्, अहंकार आदि क्रम से जगत् के आकार में परिणत होता है।
⬥ ग्रन्थ 19 ⬥
मूलम् | Original Text
द्वितीयः पक्षः सांसायोगपातञ्जलपानुपतानाम् । ब्रह्मणः परिणामा जगदिति वैष्णवानाम् । स्वप्रकाशपरमानन्दाद्वितीयं ब्रह्म स्वमाया-वशन्मिथ्यैव जगदाकारेण कल्पत इति तृतीयः पक्षो ब्रह्मवादिनाम्। सर्वेषां प्रस्थानकर्त्तृणां मुनीनां विवर्त्तवादपर्यवसानेनाद्वितीये परमेश्वर एव प्रतिपाद्ये तात्पर्यम् । न हि ते मुनयो भ्रान्ताः सर्वज्ञत्वात्तेषाम् । किन्तु बहिविषयप्रवणानामापाततः पुरुषार्थ प्रवेशो न सम्भवताति नास्तिक्यवारणाय तंः प्रकारभेदाः प्रदर्शिताः । तत्र तेषां तात्पर्यमबुद्ध्वा वेदविरुद्धेऽप्यर्थे तात्पर्यमुत्प्रेक्ष्यमाणास्तन्मतमेवोपादेयत्वेन गृह्णन्तो जना नानापथजुषो भवन्तीति सर्वमनव्द्यम् ।
॥ इति श्रीमधुसूदनसरस्वतीविरचितः प्रस्थानभेदः ॥
॥ इति श्रीमधुसूदनसरस्वतीविरचितः प्रस्थानभेदः ॥
Hindi Translation
सांख्य, योग, पातञ्जल तथा पाशुपत मत में पूर्वकाल में भी सूक्ष्म रूप से सत्=विद्यमान कार्य ही कारण के व्यापार से अभिव्यक्त होता है यह द्वितीय पक्ष है। ब्रह्म का परिणाम यह जगत् है- यह वैष्णवों का मत है। स्वप्रकाश, परमानन्द, अद्वितीय ब्रह्म अपनी माया के कारण जगत् की मिथ्या ही कल्पना करता है-यह ब्रह्म वादियों का तृतीय पक्ष है। सभी प्रस्थानों के कर्त्ता मुनियों का विवर्त्तवाद में ही पर्यवसान होने के कारण अद्वितीय परमेश्वर की प्रदिपाद्यता में ही तात्पर्य है। मुनि सर्वज्ञ होते हैं, इसलिये उनको भ्रान्त नहीं कहा जा सकता, किन्तु बाह्य-विषयों में आसक्त पुरुषों को आपाततः परम पुरुषार्थ में प्रवेश सम्भव नहीं है। अतः उनके नास्तिक्य वारण के लिये मुनियों ने प्रकार भेद का प्रदर्शन किया है! उसमें उनका तात्पर्य न जानकर वेद विरुद्ध अर्थ में भी तात्पर्य को उत्प्रेक्षित करते हुए और उनके मतों को ही उपादेय मानकर ग्रहण करते हुए मनुष्य अनेक मार्गों के अनुयायी हो जाते हैं। इस प्रकार सभी प्रस्थानों का निरुपण हुआ ।
॥ इस प्रकार श्री मधुसूदनसरस्वती विरचित प्रस्थानभेद की हिन्दी व्याख्या समाप्त हुई ॥
॥ इस प्रकार श्री मधुसूदनसरस्वती विरचित प्रस्थानभेद की हिन्दी व्याख्या समाप्त हुई ॥